मसलके आला हजरत क्या है, और ये क्यों जरूरी है

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*मसलके आला हजरत क्या है, और ये क्यों जरूरी है ?*

*इज़हार ए हक़ीक़त*
*📖पोस्ट:-1*

🌟शैखुल इस्लाम वल मुस्लेमीन इमाम अहले सुन्नत मुजदिदे दीन व मिल्लत अज़ीमुल बरक़त आला हजरत इमाम अहमद रज़ा बरेलवी कुद्दसा सिर्रुह की जाते मुक़द्दसा आज मोहताजे तआरुफ़ नही ! अरब व अज़म, एशिया व अफ़्रीका, बर्रे सग़ीर बल्कि आलमे इस्लाम मे वह अहले सुन्नत व जमाअत के एक इमाम व मुक़्तदा की हैसियत से जाने व पहचाने जाते हैं ! वह मुसलमान ए आलम के दिलों की धड़कन ओर वजहे इफ़्तिख़ार है ! दुनिया की अक्सरियत उन्हें मज़हब व मिल्लत का मुहाफ़िज़ व पासबान जानती है !

❄उनकी बसीरत व दानाई पर ज़माना हैरान है ! उन्होंने दीन व सुन्नत की तरविज़ में नुमायां हिस्सा लिया ! मज़हब ए हक़ और मसलके सही पर लोगों को गामज़न रहने की ताक़ीद व तलक़ीन फ़रमाई ! फ़र्जनदाने इस्लाम के दिलों में इश्क़ रिसालत की शमा रौशन की ! उन्हें ईमान और इस्लाम के पाकीज़ा रास्ते पर चलने की दावते फ़िक़्र दी ! वह आशिके रसूल और दीने हक़ के सच्चे अलम्बरदार थे !

💎आला हजरत हमारे असलाफ़ और अकाबीर की सच्चे यादगार और अमली तस्वीर थे ! उनके नख्शे क़दम से भटके हुए इंसानों को हिदायत व इरफान की मंजिल मिली ! आला हज़रत ने कौम ए मुस्लिम को इंतिहाई नाज़ुक ओर कर्ब अंगेज़ हालात में सम्भाला दिया ! ज़लालत व गुमराही के अमीक़ गार में उन्हें गिरने से बचाया, मुसलमानों के इश्क़ व अक़ीदे की हिफाज़त फ़रमाई ! बद मज़हबी व बद अक़ीदगी की तूफानी हवाओं की जद से उन्हें महफूज़ व मामून रखा !
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पोस्ट नम्बर-:: 2⃣

*इज़हार ए हक़ीक़त*

🔆आला हजरत इमाम अहमद रज़ा ने मसलके हक़ तरविज़ व इशाअत की, दीने हक़ की दावत व इरशाद का ख़ुशगवार फ़रिज़ा अंजाम दिया ! मज़हब ए अहले सुन्नत व जमाअत पर होने वाले हमलों का दन्दान शिकन जवाब दिया ! बातिल ताक़तों के परखच्चे उड़ा दिए !

💠आलाहज़रत इमाम अहमद रज़ा ने जिस दौर में बरेली शरीफ़ की सर जमीन पर होश व ख़िरद की आंखे खोली वह इंतिहाई भयानक व पुर आशोब दौर था ! आसमान ए हिन्द पर कुफ्र व शिर्क व बिदअत व खुराफ़ात के बादल मंडरा रहे थे ! खुश अक़ीदा मुसलमानों को सिराते मुस्तक़ीम के राह से हटाने की कोशिश हो रही थी ! ऐसे भयानक दौर में क़ुदरत ने मुजद्दिदे इस्लाम आलाहज़रत को तजदीदे दीन और सुन्नत के लिए मुकर्रर फ़रमाया ! उन्होंने ताईदे ग़ैबी से अपना फर्ज़े मंसबी को पूरा किया !
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पोस्ट नम्बर-:: 3⃣

*इज़हार ए हक़ीक़त*

*मसलके आला हज़रत की सदाक़त व हैसियत*

✒आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा बरेलवी ने जब आंख खोलीं उस वक़्त आलमे इस्लाम ख़ास तौर से हिंदुस्तान के अंदर हर तरफ़ फ़ितनों का दौर दौरा था ! खुश अक़ीदा मुसलमानों को राहे रास्त पर लाने के नाम पर शिर्क व बिदअत की सनद दी जा रही थी ! अंग्रेज़ की गुलामी ओर उन्हें खुश करने के लिए मुसलमानों में तफरका पैदा किया ! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलेही वसल्लम की शान ए अक़दस में गुस्ताखियां की गईं जिसके नतीजे में मुसलमान 2 फिरकों में बट गए !

🗡आला हजरत इमाम अहमद रज़ा बरेलवी ने इन अय्याराने ज़माना का दाग़दार व बदनुमा चेहरा बे निक़ाब किया ! चूंकि आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खान की मसाई जमीला ओर कोशिशों से दीन व सुन्नत को फ़रोग़ मिला आईने सुन्नत को रिवाज़ दिया गया, ख़ास तौर से अहले सुन्नत व जमाअत, बदअक़ीदों और बद मज़हबों से मुमताज व नुमायां हो गए !

⚖इस लिए वक़्त के बड़े बड़े उलमा तशख्खूश व तफरीक़ के लिए *"मसलके आला हज़रत"* कहना शुरू किया ! मसलके आला हज़रत कहने से सहिउल अक़ीदा सुन्नी और बदअक़ीदा हन्फ़ी के दरम्यान तमीज़ पैदा हो गयी ! दूध का दूध, पानी का पानी हो गया ! लिहाज़ा मानना पड़ेगा कि मसलके आला हज़रत वही है जो दीन ए हक़ ओर सहाबा व ताबईन का मज़हब व मसलक है ! मसलके आला हजरत वही मसलक है जो हमारे असलाफ़ व अकबीरीन का मसलक है !

💯✅मसलके आला हजरत कोई नया जदीद मसलक नही बल्कि सुन्नत व जमाअत ही का दूसरा नाम आज *मसलके आला हज़रत* है !
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*मसलके आला हजरत क्या है, और ये क्यों जरूरी है ?*
पोस्ट नम्बर-:: 4⃣

*इज़हार ए हक़ीक़त*

❓बाज़ लोग यह कहते हैं कि इमाम आज़म अबू हनीफ़ा ओर हुज़ूर गौस ए आज़म रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा का मकाम व मरतबा आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा बरेलवी से बढ़ कर है अगर कहना ही था तो *मसलके इमाम आज़म* या *मसलके गौसे आज़म* कहा जाता ?

✅इसका जवाब यही दिया जाता है कि अगर ऐसी सूरत में मसलके इमाम आज़म कहा जाता तो गुमराह व बद्दीन फ़िरके ओर खुश अक़ीदा मुसलमानों के दरमियान फ़र्क़ और इम्तियाज़ दुश्वार हो जाता !

✨यही वजह है कि मसलके इमाम आज़म नही कहा जाता क्योंकि बद अक़ीदा और देवबन्दी लोग भी अपने को हन्फ़ी ओर मसलके इमाम आज़म का पैरु कहलाते हैं! इसी तरह मसलके गौस आज़म भी नही कहा क्योंकि बाज़ गुमराह मुल्हिद ओर खुराफाती लोग भी मशरबी ऐतबार से अपने को क़ादरी वगैरह कहलवाते हैं !

*💫मसलके आला हजरत* की सदाक़त व हक़ीक़त ओर उसकी शरई हैसियत यही है इस पर बेज़ा कलाम की कोई गुंजाइश नही है, इस पर एतराज व अंगुश्त नुमाई करना मसलके हक़ से बगावत करना है !

🌍छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंधप्रदेश और आसपास के शहरों के लाखों मुरीदों के *कामिल पीर हज़रत अश्शाह मुफ़्ती मुहम्मद सिबतेंन रज़ा खान बरेलवी रहमतुल्लाह तआला अलैह* फ़रमाते थे-
*मसलके आला हजरत* हमारे अकबीरीन का पसन्दीदा नारा है, इसकी मुखालफ़्त किसी शैतानी वसवसे से कम नही !
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पोस्ट नम्बर-:: 5⃣

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*👑आलाहज़रत की इल्मी फ़साहत*

🌟एक बार अलीगढ़ से एक शख़्श अपना बैग वगैरह लिए आया उसकी सुरत देख कर मेने कहा यह राफ़ज़ी है, दरयाफ्त किये तो मालूम हुआ कि वाक़ई राफ़ज़ी है ! कहा मैं अपने मकान को लखनऊ जाता था ! रास्ते मे सिर्फ ज़्यारत के लिए उतर पड़ा हूँ ! क्या आप अहले सुन्नत में ऐसे ही हैं जैसे हमारे यहाँ मुजतहेदिन, मैने इल्तिफ़ात न किया ग़रज़ की वो आदमी मुझे अपनी तरफ मुखातिब करता रहा ! और मैं दूसरी तरफ मुंह फेर लेता ! आखिर उठ कर चला गया उसके जाने जे बाद एक साहब शाकी हुए की वह इतनी दूर से मसाफ़त तय करके आया और आपने क़तई इल्तिफ़ात न फ़रमाया ! *मैंने उन्हें एक रिवायत बताई !*

*✨अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारुख का ज़माना ए ख़िलाफ़त ह*ै ! आप मस्जिद ए नबवीं से नमाज़ पढ़ कर तशरीफ़ ले जाते हैं ! एक मुसाफिर ने खाना मांगा आपने उसे अपने हमराह ले आये ! ख़ादिम बहुक़्मे अमीरुल मोमिनीन खाना हाज़िर करता है ! इत्तिफाकन खाते खाते उसकी ज़ुबान से बदमज़हबी फ़िक़रा निकल जाता है ! जिस पर हुज़ूर फ़ौरन उसके सामने से खाना उठवा लेते हैं और ख़ादिम को हुक़्म देते हैं कि इसे बाहर निकाल दे !

✔हमारे आइम्मा ने उन लोगों के साथ हमे यह तहज़ीब बताई है ! अब भला व क्या कह सकते थे खामोश हो गए !
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पोस्ट नम्बर-:: ( 6 )

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*एक बुज़ुर्ग की आलाहज़रत के लिए दुआए मग़फ़िरत*

♦पहली बार की हाज़री में मीना शरीफ़ की मस्जिद में मग़रिब के वक़्त हाज़िर था उस वक़्त मैं वज़ीफ़ा बहुत पढा करता था अब तो बहुत कम कर दिया है ! बिहम्दिल्लाह तआला में अपनी हालत वह पाता हूँ जिसमे फुकहाये किराम ने लिखा है कि सुन्नतें भी ऐसे शख़्श को माफ हैं लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह सुन्नतें कभी न छोड़ी, नफ़्ल अलबत्ता उसी रोज़ से छोड़ दिए हैं ! ख़ैर जब लोग मस्जिद से चले गए तो मस्जिद कर अंदुरुनी हिस्सा में एक साहब को देखा कि क़िबला रु वज़ीफ़ा में मसरूफ़ हैं ! मैं सहने मस्जिद में दरवाज़ा के पास था पर कोई तीसरा मस्जिद में न था, यकायक एक आवाज़ गंगनाहट की सी अंदर मस्जिद के मालूमा हुई जैसे शहद की मक्खी बोलती है फ़ौरन मेरे क़ल्ब में ये हदीस आई कि~
*अहलुल्लाह के क़ल्ब से ऐसी आवाज़ निकलती है जैसे शहद की मख्खी बोलती है !*

📿मैं वज़ीफ़ा छोड़ कर उनकी तरफ़ चला कि उन से दुआए मग़फ़िरत कराउ, कभी में किसी बुजुर्ग के पास दुनियावी हाजत लेकर न गया जब गया तो इसी ख्याल से की उन से दुआए मग़फ़िरत कराउूँगा , ग़रज़ 2-3 क़दम उनकी तरफ़ चला था कि उन बुज़ुर्ग ने मेरी तरफ़ मुंह करके आसमान की तरफ़ हाथ उठा कर तीन मर्तबा फ़रमाया ::
*ए अल्लाह मेरे इस भाई की मग़फ़िरत फरमा !*
*इलाही मेरे इस भाई को बख्श दे !*
*परवरदिगार मेरे इस भाई के गुनाहों को माफ़ फ़रमा !*

💠में समझ गया कि फ़रमाते हैं हमने तेरा काम कर दिया अब तू हमारे काम मे मुखल न हो मैं वेसे ही लौट आया !
*📚【फैज़ान ए आला हजरत, सफ़ा 300】*
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पोस्ट नम्बर-:: 7⃣

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*आला हज़रत की ग़ैबी मदद*

🌟मेरी उमर 19 साल की थी ! उस वक़्त रामपुर की रेल न थी, बैलगाड़ी पर सवार हो कर गया साथ मे औरतें भी थीं, रास्ता में दरिया पड़ा गाड़ी वाले ने ग़लती से बैलों को उसमे हांक दिया उसमें दलदल थी बैल पहुँचते ही घुटनों तक धंस गए और निसफ़ पहिया गाड़ी का, जितना बैल ज़ोर करते अंदर धँसते चले जाते थे अब में निहायत हैरान की साथ मे औरतें हैं उतर सकता नही की दलदल में खुद धंस जाने का अंदेशा !

💎इसी परेशानी मे था की एक बुढ़े आदमी जिनकी सूरते नूरानी और सफेद दाढ़ी थी न इस से पहले उन्हें देखा था, न जब से अब तक देखा तशरीफ़ लाये और फ़रमाया क्या है !
मेने तमाम वाक़या अर्ज़ किया फ़रमाया यह तो कोई बात नही ! गाड़ी वाले से फ़रमाया हाँक ! उसने कहा किधर हाँकू ! आप देखते हैं कि दलदल में गाड़ी फंसी है ! फ़रमाया अरे तुझे हांकना नही आता ! उधर को हाँक यह कह कर पहिया को हाथ लगाया फ़ौरन गाड़ी दलदल से निकल गयी ! ऐसी मउनतें तो बिहम्दिल्लाह तआला बहुत ज़ाईद हुईं !
*📚(फैज़ान ए आला हजरत, सफा 299)*
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*है, और ये क्यों जरूरी है ?*
*पोस्ट नम्बर-:: 8⃣*

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*इस्मे जलालत और नाम मुबारक का अदब*

🌟एक रोज़ मौलाना हसनैन रज़ा खां साहब बराए जवाब कुछ इस्तीफते सुना रहे थे और जवाब लिख रहे थे एक कार्ड पर इसमे जलालत लिख गया उस पर आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा बरेलवी ने इरशाद फ़रमाया ::
याद रखो में कभी 3 चीज़ें कार्ड पर नही लिखता:
*♦इसमे जलालतुल्लाह*
*♦और मुहम्मद और अहमद*
*♦और न कोई आयत ए करीमा*

✒मसलन अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम लिखना है तो यूँ लिखता हूं हुज़ूर अक़दस अलैहि अफ़ज़लूस्सलातु वसल्लाम या इसमे जलालत की जगह मौला तआला !
*📚(अल-मलफूज़ अव्वल, सफा 115)*
*📚(फैज़ान ए आला हजरत, सफा 299)*

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पोस्ट नम्बर-:: 9⃣

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*क़दम बोसी से नागवारी*

📄आला हज़रत एक साहब की तरफ़ मुतवज़्ज़ह होकर हुक़्म मसला इरशाद फ़रमा रहे थे एक और साहब ने यह मौका कदमबोसी से फ़ैज़ याब होने का अच्छा समझा, क़दम बोस हुए फौरन चेहरा ए मुबारक का रंग मुतगैयर हो गया और इरशाद फ़रमाया इस तरह मेरे क़ल्ब(दिल) को सख़्त अज़ीयत होती है यूँ तो हर वक़्त क़दम बोसी नागवार होती है मगर दो सूरतों में सख़्त तक़लीफ़ होती है !

*🌟एक तो उस वक़्त की मैं वज़ीफ़ा में हूँ !*
*🌟दूसरे जब मैं मशगूल हूँ और गफ़लत में कोई क़दम बोस हो उस वक़्त में बोल नही सकता !*

👑मैं डरता हूँ खुदा वह दिन न लाये की लोगों की कदमबोसी से मुझे राहत हो और जो क़दमबोस न हो तो तकलीफ़ हो कि यह हलाकत है !
*📚(फैज़ान ए आला हज़रत, सफा 299)*

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*आशोबे चश्म का इज़ाला*

*[अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी आफ़ानी मिम्मब्तलाका बेही व फ़ज़्ज़लनी अला कसिरिन मिम्मन खलक़ा तफ़ज़ीला]*

❄जिन जिन अमराज़ के मरीज़ों जिन जिन बलाओं के मुबतलावों को देख कर मैंने पढा बहम्देही तआला आज तक उनसे महफूज़ हूँ ! और बेऔनेही तआला हमेशा महफूज़ रहूंगा ! अलबत्ता एक बार उसे पढ़ने का मुझे अफ़सोस है मुझे नो उमरी में अक्सर आशोबे चश्म अक्सर हो जाता और बेवजहे हिद्दत मिजाज़ बहुत तकलीफ़ देता था ! 19 साल की उम्र होगी कि रामपुर जाते हुए एक शख़्श को रम्दे चश्म में मुब्तिला देख कर यह दुआ पढ़ी, जब से अब तक आशोबे चश्म न हुआ !

✨उसी ज़माना में सिर्फ 2 मरतबा ऐसा हुआ कि एक आंख कुछ दबती मालूम हुई दो चार दिन बाद वह साफ हो गयी, दूसरी दबी फिर वह भी साफ हो गयी ! मगर दर्द खटक सुर्खी कोई तक़लीफ़ असलन किसी किस्म की नही ! अफसोस इसलिए कि-:
हुज़ूर ए अकरम से हदीस है की 3 बीमारियो को मकरूह न रखो-
1-: ज़ुकाम की इसकी वजह से बहुत सी बिमारियों की जड़ कट जाती है !

2-: खुजली कि इससे अमराज़ ए जिल्दिया जुज़ाम वगैरह का इंसीदाद हो जाता है !

3-:आशोबे चश्म नाबिनाई को दफ़ा करता है !
*📚(फैज़ान ए आला हजरत, सफा 288)*
*➡उनवान खत्म*

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