दर्से जवाहिरुल हदीस

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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣*

*🌪️फ़रिश्ते पर बिछा देते हैं*

💫 कसीर बिन कैस का बयान है कि हजरत अबू दरदा सहाबी रदियल्लाहु तआला अन्हु के पास दमिश्क की मस्जिद में बैठा हुआ था तो उनके पास एक आदमी आया और कहा कि ऐ अबू दरदा ! मै आपके पास मदीनतुर्रसूल से एक हदीस सुनने के लिए आया हूँ! जिसके मुताल्लिक मुझे खबर मिली है कि आप इस को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से! रिवायत करते हैं मैं इसके सिवा किसी और जरूरत से नहीं आया हूँ यह सुनकर हजरत अबू दरदा ने फरमाया कि मैंने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह फ़रमाते सुना कि जो शख्स इल्म तलब करने के लिए किसी रास्ते में चलेगा तो अल्लाह तआला उसको जन्नत के रास्तों में से एक रास्ते पर चलायेगा! और यकीनन फ़रिश्ते तालिबे इल्म की खुशनूदी के लिए अपने परों को बिछा देते हैं! और बेशक आसमान व जमीन की तमाम मखलूकात और पानी के अन्दर की मछलियाँ यह सब उसके लिए दुआऐ मगफिरत करती हैं! और यकीन रखो कि आलिम की एक आबिद पर वही फजीलत है जो चौदहवीं रात के चाँद को तमाम सितारों पर फजीलत हासिल है । और बिला शुबा उल्मा अम्बिया के वारिस हैं और हज़रात अम्बिया अलैहिमुस्सलाम ने किसी को दिरहम व दीनार का वारिस नहीं बनाया है बल्कि उनकी मीरास तो इल्म ही है तो जिसने इल्म हासिल किया उसने बहुत बड़ा हिस्सा पा लिया! *इस हदीस को तिर्मिज़ी व अबू दाऊद व इब्ने माजा व दारमी ने रिवायत किया है-*
*(📚मिशकात जिल्द 1सफह 24)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣*

*🌪️फ़रिश्ते पर बिछा देते हैं*

🌟इस हदीस से यूँ तो बहुत से मसाइल साबित होते हैं मगर मुन्दरजा जैल फवाइद व मसाइल पर खास तौर से रौशनी पड़ती है । एक मुसलमान ने सिर्फ एक हदीस सुनने के लिए मदीना मुनव्वरा से मुल्के शाम का सफर किया । इससे मालूम होता है कि अगले मुसलमानों में इल्मे हदीस हासिल करने को कितना जौक व शौक और किस कदर जज्बा व इश्क था । कि बावजूद कि उसदौर में सफर की मुश्किलात इन्तिहाई होशरुबा और परेशान कुन थीं । फिर भी लोग इल्मे दीन के लिए इतना दुश्बार गुजार सफर करने से नहीं घबराते थे! 

👤लेकिन आजकल का मुसलमान वअज की मजलिसों और मदारिसे इस्लामिया में चन्द कदम चल कर जाने और इल्मे दीन की बातें सुनने से घबराते और कतराते हैं । इस सूरते हाल को आज कल के मुसलमानों की कम नसीबी और महरुमी के और क्या कहा जा सकता है ? खुदावन्द करीम हम मुसलमानों पर रहम फरमाये और हम को हमारे असलाफ के मुकद्दस तरीकों पर चलने की तौफीक अता फरमाये! आमीन!!

*(📚जवाहिरुल हदीस सफ़ह,12)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣*

*💎जन्नत के रास्ते पर है*

✨जो इल्मे दीन हासिल करने के लिए किसी रास्ते में चलेगा अल्लाह तआला उसको जन्नत के रास्तों में से एक रास्ते पर चलायेगा हदीस के इस टुकड़े में इल्मे दीन के उन तालिबे इल्मों के लिए बहुत ही अजीम बशारत है जो अपने वतन से दूर जा कर मदारिसे इस्लामिया में इल्म दीन हासिल कर रहे हैं! अल्लाह तआला ने उन लोगो को जन्नत के किसी रास्ते पर चलाने का वादा फरमा लिया है! गोया इल्मे दीन के तलबा जन्नत का सफर करने वाले मुसाफिर हैं! अब जाहिर है कि ऐसे मुबारक सफर यानी जन्नत के मुसाफिर कितने मुअज्जिज और किस कदर लाइके ताजीम व काबिले एहतिराम हैं! मगर अफसोस कि आज कल के मुसलमान मदारिसे दीनिया के इन तलबा को इन्तिहाई हिकारत से देखते हैं । और बजाऐ उनकी खातिर व मदारत और दिल जोई करने के उन पर फब्तियाँ कसते और उनकी दिल आजारी करते रहते हैं 

🌟मुस्लिम अवाम की इस जहनियत को हम आज कल के मुसलमानों की ईमानी कमजोरी और दीन में बद जौकी के सिवा और क्या कह सकते है! खुदावन्द करीम मुसलमानों को ईमानी जज्बा और इस्लामी जौक अता फरमाये । आमीन!
*(📚जवाहिरुल हदीस सफ़ह,12)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣*

*📝फकीह साहिबे खैर हैं*

💫हज़रत अमीरे मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसके साथ अल्लाह तआला खैर का इरादा फरमाता है तो उसको दीन में फकीह बना देता है । और मैं हर नेअमत को तकसीम करने वाला हूँ! और अल्लाह तआला उसका अता फरमाने वाला है । 

📜इस हदीस में खैर से मुराद दीन व दुनिया की भलाई व नेअमतें हैं । लिहाज़ा हदीस शरीफ का मतलब यह हुआ कि जिस शख्स को तुम देखो कि दीन के मसाइल का आलिम है तो समझ लो कि यह वह खुश नसीब आदमी है कि जिसे अल्लाह तआला ने दीन व दुनिया की तमाम नेअमतें और सारी भलाईयाँ अता करने का इरादा फरमा लिया है! और इस *हदीस का आख़िरी हिस्सा इन्नमा अना कसिमुन वल्लाहु योअती में कासेमुन और) (योअती (दोनों का मफऊल महजूफ* है और इल्मे मआनी का कायदा है कि जहाँ मफ़ऊल इतना आम होता है कि उसके अफराद का शुमार दुश्बार हो तो उस मफऊल को हज्फ कर दिया जाता है और हर शख्स का ईमान व अकीदा है कि अल्लाह तआला छोटी बड़ी चीजों का अता फ़रमाने वाला है 

🌸यकीनन हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर छोटी बड़ी चीजों के बाँटने वाले हैं क्योंकि जो योअती का मफऊल है वही कासिम का भी मफऊल है! वरना कलाम बे रस्त हो जायेगा यह और बात है कि यहाँ हदीस में फिकह का तजकिरा है इस करीना से यहाँ योती और कासिम का मफऊल महजूफ इल्मे दीन को बनाया जायेगा! कि इल्मे दीन का अता फरमाने वाला तो अल्लाह तआला है मगर इसकी तकसीम करने वाले रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं! जिस तरह कि तमाम नेअमतों को अता फरमाने वाला अल्लाह है और उन तमाम नेअमतों की तकसीम करने वाले रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं! अहले सुन्नत व जमाअत का यही अकीदा है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुदावन्द कुद्दूस जल्ला जलालहु के नायबे मुकर्रम व खलीफाऐ आज़म हैं और अल्लाह तआला तमाम नेअमतों को अता फरमाने वाला है और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ही तमाम नेअमतों को उसके हुक्म से कासिम और बाँटने वाले हैं!! 

*आला हज़रत अलैहिर्रहमा ने क्या खूब फरमाया है...✍🏼*
रब है मोअती यह हैं कासिम

रिज्क उसका है खिलाते यह हैं । 

📿अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्येदिना व मौलाना मुहम्मदिन व अला आलेहि व असहाबेहि व बारिक वसल्लिम ।
*(📚मिशकात" जिल्द-1- सफह 32 )*
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            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣*

*🔥जहन्नम में चक्की चलाने वाला*

📿हज़रत उसामा बिन जैद रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया क कयामत के दिन एक आदमी को लाकर जहन्नम में डाल दिया जायेगा तो उसकी अन्तड़ियाँ निकल पड़ेंगी और वह चक्कर लगाता और उन अन्तड़ियों को रौन्दता होगा जिस तरह गधा अपनी चक्की चलाता और उसके गिर्द घूमता रहता है तो अहले जहन्नम उसके पास जमा होकर उससे कहेंगे कि ऐ फलों तेरा क्या हाल है? क्या तू हमें अच्छी बातो का हुक्म और बुरी बातों से मना नहीं करत था? तो वह कहेगा कि मैं तुम लोगों को अच्छी बातों का हुक्म दिया करता था मगर खुद उन बातों पर अमल नही किया करता था और मैं तुम लोगों को बुरी बातों से मना करता था मगर खुद बुरी बातें किया करता था। 

📜यह हदीस उन वाइज़ों के लिए बहुत बड़ा ताज़ियानए इबरत है जो गला फाड़, फाड़ कर मुसलमानों को आमाले सॉलेहा की तरगीब का वाअज फरमाते रहते हैं मगर खुद कभी कोई नेक अमल नहीं करते। इसी तरह मुसलमानों को गुनाहों से बचने की बहुत ज़्यादा ताकीद करते हैं लेकिन खुद रात दिन उन्हीं गुनाहों में मुलव्विस रहते हैं। अल्लाह तआला हमारे उल्माए किराम और याइज़ों को हिदायत दे और वह जो कुछ कहते हैं उन पर उनको भी अमल की तौफीक बख्शे और जहन्नम में चक्की चलाने के अज़ाब से महरूम रखे। आमीन ।वल्लाहु तआला अअलम

*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 28)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣*

*🔥बद अमल वाअज़ीन*

📜हजरत अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मैंने शबे मेअाज में देखा कि कुछ लोगों के होंठ आग की कैचियों से काटे जा रहे हैं तो मैंने दरयाफ्त किया कि ऐ जिबरईल ! यह कौन लोग हैं तो उन्होनें कहा कि यह आप की उम्मत के वाअजीन हैं जो लोगों को तो नेकी करने का हुक्म देते हैं और खुद अपनी जातो को भूले हुए हैं और दूसरी रिवायत में है कि यह आप की उम्मत के वह वाए जीन है जो लोगों से ऐसी बाते कहते हैं जिन को वह खुद नही करते और अल्लाह की किताब पढ़ते हैं और उस पर अमल नहीं करते ।

👥लोगों को अच्छी अच्छी बातों का हुक्म देना और खुद उन बातों पर अमल न करना यह बहुत मायूब बात और गुनाह का काम है कुरआन मजीद में खुदावन्द कुददूस ने इरशाद फरमाया कि अतामुरुनन नासा बिल बिरें व तन सौना अनफुसाकुम व अन्तुम ततलूनल किताब तकूलूना माला यानी क्या तुम लोग दूसरों को नेकी का हुक्म देते हो और अपनी जातो को भुला बैठे हो हालाँकि तुम लोग किताबें इलाही की तिलावत करते हो एक जगह कुरआन मजीद में अल्लाह अज्जा वजल्ला ने लग्व ( बेकार ) शोअराऐ जाहिलियत की मजम्मत करते हुए फरमाया तफअलून यानी वह ऐसी बातें कहते हैं जिन पर खुद अमल नहीं करते बहर हाल इस दौर के उन मुकर्ररीन के लिए जो शरीअते मुतहरा की पाबन्दी नहीं करते इस हदीस में बहुत बड़ा इबरत का सामान है और ऐसी शदीद वईद है कि जिसको सुनकर हर मुसलमान लरजा बर अन्दाम हो जाता है और हकीकत यह है कि आज कल के वाअजीन के मुवाइज और तकरीरों में जो असर व तासीर की कमी हो गई है उसका एक बहुत बड़ा सबब यह है कि अक्सर वा जीन बे अमल बल्कि बद अमल हो चुके हैं इसलिए उनके वाइजो के असरात सामाईन के कुलूब पर बहुत कम पड़ते हैं अगर सल्फ सॉलेहीन और पुराने बुजुर्गाने दीन की तरह दौरे हाजिर के वाअजीन भी पैकरे इल्मो अमल बन कर वअज फरमायें तो यकीनन उनके मवाइज में वह तासीरात रुनुमा होंगी लोग सामने जोशे तअस्सुर से सर धुनने लगेंगे और उनकी दुनियाऐ दिल में वह इन्किलाब पैदा हो जायेगा कि वह चश्मे जदन में कामिलुल ईमान और सालेहुल अमल बन जायेंगे बुर्जुगों ने सच फरमाया कि अजदिल खेजद व बर दिल रेजद यानी:- *दिल से जो बात निकलती है असर रखती है पर नही ताकते परवाज मगर रखती है*

📝लिहाजा मुकरीन और वाअजीन से निहायत हमदर्दाना और मुख्लिसाना गुजारिश है कि वह रोजा व नमाज वगैरह फराइज की पाबन्दी करें और कोई ऐसा काम न करें जिससे अवाम के दिलों में उल्माए किराम से बद जनी और बद अकीदगी पैदा हो क्योंकि कुछ बेदीन व मुलहेदीन इस कोशिश में लगे हुए है कि अवाम को उल्माए किराम से बद जन करके दीन व मजहब से बेजार कर दें और उन्हे ला मजहब कम्यूनिस्ट बना डालें यह रुसी हुकूमत के ऐजेन्टो का मकसद और नसबुल ऐन है दूसरे तबलीगी और वहाबी जमाअत के लोग इस ताक में रहते हैं कि सुन्नी आलिमों की कुछ कमजोरियाँ उन्हें मिल जाएँ तो वह उनका चर्चा करके अवाम को सुन्नी उल्माऐ अहले सुन्नत को चाहिये कि वह इन खतरात को पेशे नजर ज्यादा से ज्यादा अपने मामलात की इस्लाह कर लें ताकि उनका वजूद अवाम के लिए बाइसे इस्लाह और मोजिबे हिदायत बन जाए ।
*(📚जवाहिरुल हदीस सफ़ह,28,29)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣*

*👤बद नीयती से इल्म पढ़ने वाला जहन्नमी है*

💎हदीस :- हजरत कब इब्ने मालिक कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो इस लिए इल्म तलब करे ताकि आलिमों का मुकाबला करे। या इस लिए इल्म हासिल करे ताकि जाहिलों से झगड़ा करे। या इसलिए इल्म पढ़े ताकि लोगों को अपनी तरफ माइल करे तो उन सभों को अल्लाह तआला जहन्नुम में दाखिल कर देगा।

📝हदीस:- हजरत अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु रावी है कि,रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स उस इल्म को जो रजाए इलाही हासिल करने का जरीआ है इस नियत से हासिल करे ताकि उसके जरिये दुनिया का सामान पा लें। तो कयामत के दिन यह जन्नत की खुश्बू भी नहीं पायेगा।

*तशरीहे हदीस* :- मजकूरा बाला दोनों हदीसो में इल्म से मुराद इल्मे दीन है। यानी जो शख्स इल्मे दीन को अल्लाह व रसूल की खूशनूदी की नियत से हासिल न करे बल्कि इस नियत से पढ़े कि कुछ मालूमात हासिल करके उल्मा से लड़ झगड़ कर उनका मुकाबला करे या जहिलो से हुज्जत व तकरार करें। उन पर अपनी बड़ाई और बरतरी जाहिर करे। या उस इल्मे दीन को दुनिया कमाने का ज़रीआ बनाये तो ऐसी बुरी नियतों से
इल्मे दीन हासिल करने वालों को खुदावन्द, कहहार व जब्बार अपने कहरो गज़ब से जहन्नम में दाखिल फरमा देगा। और उन लोगों को जन्नत से दूर कर देगा कि उन लोगों को जन्नत की खुशबू भी नसीब नहीं होगी। खुलासा यह है कि इल्मे दीन हासिल करने वाले का अजरों सवार बहुत बड़ा है जैसा कि इससे पहले बहुत सी हदीसें नकल की जा चुकी हैं मगर वाजेह रहे कि इल्मे दीन हासिल करना उसी वक्त और उसी हालत में बाइसे अजरो सवाब होगा जब कि उसकी नियत बखैर हो। यानी वह इल्मे दीन इस नियत से हासिल करे कि खुद भी.उस पर अमल करके सआदते दारैन हासिल करें और उम्मते रसूल को भी खहे और हरगिज हरगिज़ इल्मे दीन को दुनिया कमाने और आलिमों से बहस करने और जाहिलों से झगड़ने और अयाम में अपनी मकबूलियत और शोहरत हासिल करने की नियत से.हासिल न करे।बहर हाल मतलब यह है कि इल्मे दीन हासिल करने में अल्लाह व रसूल की रज़ा की नियत करे। इसके सिवा हरगिज़ कोई फासिद नीयत न करें जब तो वह इल्मे दीन बाइसे अजरो सवाब और जन्नत में ले जाने वाला अमले खैर होगा। वरना सरासर बाइसे वबाल व निकाल होगा।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 30,31)*
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            *पोस्ट नम्बर:: 8️⃣*

*👤लालच उल्मा के दिलों से इल्म को निकाल देगा*

*📝हदीस :-* हजरत सुफयान सौरी रहमतुल्लाह अलैहि रावी हैं कि हज़रत उमर बिन खत्ताब रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हजरत कअब रदियल्लाहु तआला अन्हु से पूछा कि“ इल्म वाले कौन लोग हैं ? तो उन्होंने
कहा कि जो लोग इल्म पर अमल करते हैं। फिर हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने पूछा कि वह कौन सी चीज़ है जो उल्मा के दिलों से इल्म को निकाल फेंकेगी? तो हजरत कअब ने फरमाया कि दुनिया का लालच ।
*📄तबसरा:* हदीसे मजकूरा का खुलासा व मतलब यह है कि दर ,हकीकत आलिम कहलाने के मस्तहिक और हकदार वही लोग हैं जो इल्मे दीन पढकर उसपर अमल भी करें। और वह आलिम जो बे अमल या बद.अमल हों वह हरगिज़ हरगिज़ हकीकी मअनों में आलिम कहलाने का मुस्तहिक नही है। हज़रत शैख़ सअदी अलैहिर्रहमा ने क्या खूब फरमाया है जो इसी हदीस का तर्जुमा है कि - 
*-इल्म ~ चन्दाँ ~ कि ~ बेशतर ~ ख्वानी ~ चू ~ अमल ~ दरें ~ तू~ नीस्त ~ नादानी~*

*आँ ~ तही ~ मगज ~ रा ~ चे~ इल्म ~ व ~ ख़बर'~कि ~ बरो ~ हिजम ~ अस्त'~ या ~ दफ्तर~*

💫यानी इल्म जितना और जिस कंदर भी ज्यादा तुम पढ़ लो लेकिन जब तुम उस पर अमल न करो तो तुम नादान और जाहिल ही रहो। उस बेवकूफ को क्या ख़बर है कि उसके ऊपर लकड़ियाँ लदी हुई हैं या किताबों का बोझ है।मतलब यह है कि जिस तरह एक गधे के ऊपर लकड़िये लदी हों या किताबें लदी हों दोनों बोझ गधे के हक में बराबर हैं। यही मिसाल आलिमे बे अमल की है कि इस पर किताबें लदी हुई हैं मगर उन किताबों से कोई फायदा नहीं पहुंच रहा है।हज़रत अमीरुल मोमिनीन फारुके आजम रदियल्लाहु तआला अन्हु ने दूसरा सवाल. हज़रत कअब से यह किया कि वह कौन सी चीज़ है जो उल्मा के दिलों से इल्म और उसकी बरकतों को निकाल फेंकेगी? और उल्मा पर इल्म और उसके अनवार व बरकात का कोई असर व निशान बाकी न रह जाएगा। तो हज़रत कअब रदियल्लाहु तआला अन्हु ने यह जवाब दिया कि वह, "तमाअ है यानी जब उल्मा कि दिलों में हिरस व लालच की नहूसत घर कर जायेगी तो उनके दिलों से इल्मे दीन और उसकी बरकतों के अनवार व.बरकात निकल-जायेंगे। और वह जाहिलों की तरह दुनिया तलबी में लग जायेंगे। फिर यह बराय नाम आलिम रह जायेंगे। और दर हकीकत उनमें और जाहिलों के अमल व किरदार में जर्रा बराबर फर्क बाकी न रह जायेगा।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, ,31,32)*
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            *पोस्ट नम्बर:: 9️⃣*

*🕋रोज़ाना एक हज और एक उमरा*

*📝हदीस* :- हजरत अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स नमाजे फज्र बा जमाअत अदा करके फिर बैठ कर सूरज तुलूअ होने तक जिक्र करता रहे फिर दो रकअत नमाज़ नफ्ल पढ़ ले तो उसको एक हज और एक उमरा का सवाब मिलेगा। आपने यह भी तीन मरतबा फरमाया कि पूरा पूरा

*(यानी हज* *व* *उमरा का सवाब *पूरा*
*पूरा मिलेगा)*

*💎तबसरा* :- छोटी से छोटी इबादत पर अल्लाह तआला बड़े से बड़ा सवाब अता फरमा दे यह उसका फजले अजीम है। गौर कीजिए कि सिर्फ दो रकअत नमाजे इश्राक पर एक हज और एक उमरा के बराबर सवाब अता फ़रमा देना। यह उसका फल ही तो है। वरना कहाँ दो रकअत नमाजे इशराक? और कहाँ मक्का मुकर्रमा जाकर दौलत खर्च करके और तवील मशक्कत उठाकर हज व उमरा अदा करना? भला दोनों बराबर कैसे हो सकते हैं? मगर चूँकि अल्लाह तआला के रसूल का यह इरशाद है इसलिए इस पर यकीन हर मुसलमान के लिए लाजिमुल अमल और वाजिबुल ईमान है। मगर याद रखिये कि दो इबादतों के सवाब में बराबरी होने से यह लाजिम नहीं आता कि हर ऐतिबार से वह दोनों इबादते बराबर हो जायेंगी।यह बिल्कुल सही है कि नमाजे इश्राक पर एक हज और एक उमरा का सवाब मिलेगा। मगर दोनों बराबर होने से मरातिब व दरजात में बुलन्दी और चीज है। दोनों में बड़ा फर्क है। फिर दोनों के सवाब का कीमत और मिकदार में बराबर होने से कैफियत और कद्रे व कीमत में बराबर होना लाज़िम नहीं आता। उसको यूँ समझें कि एक तोला सोना और एक तोला लोहा वज़न और मिकदार में दोनो बराबर हैं मगर कद्रो कीमत में हरगिज दोनों बराबर नहीं।इसी तरह एक पाव हलवा और एक पाव सत्तू वजन और मिकदार और पेट भर देने के मामले में तो दोनों बराबर हैं मगर कदरो कीमत और लज्जत की कैफियत में हरगिज दोनों बराबर नहीं तो इस तरह समझ लो कि दो रकअत नमाजे इश्राक और मक्का मुकर्रमा जाकर हज व उमरा करना। दोनों का सवाब अगरचे फज़ले खुदावन्द से बराबर है मगर मरातिब और दरजात और कद्र व मनज़िलत में नमाजे इराक और हज व उमरा दोनो हरगिज़ बराबर हैं नहीं। इस लिए बिला शुबा हज व उमरा का सवाब बहुत ही इज्जत व अजमत वाला और निहायत ही कद्रो मन्ज़िलत वाला है और इन दोनों के सवाब की अज़मत और बुजुर्गी के बुलन्द से बुलन्द दरजात व मरातिब अल्लाह व उसके रसूल ही को मालूम हैं। लेकिन बहर हाल नमाज इश्राक का सवाब हज व उमरा के बराबर
है अगरचे मरातिब व दरजातं में हज व उमरा से कम है। फिर भी नमाजे इश्राक का बहुत बड़ा सवाब है। और यह एक ऐसी आसान इबादत है जिसको हर मुसलमान बिला किसी खर्च और बगैर किसी मशक्कत के अंदा कर सकता है लिहाजा इस पर अमल करके उसके सवाब को हासिल करना हर मुसलमान के लिए बहुत बड़ी सआदत है। मौला तआला सबको इस पर अमल करने की तौफीक अता फरमायें। आमीन
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 32,33)*
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            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣0️⃣*

*⚡खुफिया सदके की ताक़त*

*📜हदीस* :- हजरत अनस रदियल्लाहो तआला अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब अल्लाह तआला ने जमीन व आसमान को पैदा फरमाया तो जमीन हिलने लगी. तो अल्लाह तआला ने उस पर पहाड़ों को पैदा फरमाया। तो वह बरकरार हो गई। तो फरिश्तों को पहाड़ की ताकत से बहुत तअज्जुब हुआ और उन्होंने अर्ज किया कि ऐ परवरदिगार! क्या तेरी मखलूकात में पहाड़ से ज्यादा ताकतवर कोई चीज़ है? तो इरशाद फरमाया कि हाँ ! लोहा है। तो फरिशतों ने कहा कि क्या लोहे से भी ताकतवर कोई मखलूक है? तो फरमाया कि हाँ आग है। तो फरिश्तों ने कहा कि क्या तेरी मखलूक में आग से ज्यादा ताकतवार कोई चीज है? तो फरमाया हाँ पानी। तो फरिश्तो ने फरमाया कि क्या पानी से भी ताकतवर कोई मखलूक है? तो फ़रमाया कि हाँ हवा है । तो फरिश्तों ने कहा कि क्या तेरी मखलूकात में हवा से भी बढ़कर ताकतवर कोई चीज है? तो फरमाया कि हाँ इब्ने आदम का वह सदकां जिसको वह अपने दाहिने हाथ से इस तरह दे कि बायें हाथ से भी छुपाए *(यानी खूब छिपा कर सदका करे)*

*📑तबसरा* :- हदीस शरीफ का मतलब यह है कि पहाड़, लोहा, आग, पानी, हवा, यह सब अगरचे बहुत ही ताकतवर मखलूकात में से हैं मगर बलाओं और मुसीबतों को जिस तरह इब्ने आदम का छुपा हुआ सदका टाल देता है उसको न पहाड़ टाले सकते है न लोहे के औज़ार और हथियार, न आग के अलाव, न पानी के सैलाब, आंधियों के तूफान, लिहाज़ा साबित हुआ कि उन सबसे ज्यादा ताकतवर चीज़ मुसलमान का वह सदका है।जिसको इस तरह छुपा कर दे कि दाहिने हाथ से दे तो बायें हाथ को उसकी ख़बर न हो। क्योंकि बलाओं और मुसीबतों को टालने और दफा करने में सब से बढ़ कर ताकतवर यही सदका है क्योंकि बरस हा बरस का अपना और अपने बुर्जुगों का यही तर्जुबा है कि प्लेग या कालरा या चेचक वगैरह की बलाओं और वबाओं का जोर हुआ। या सैलाब आ गया या तवील मूसला धार बारिश का सिलसिला शुरु हो गया तो अवाम व हुकूमत की पूरी कोशिश और तदबीरों और हर किस्म के इलाज व मुआलिजा के बावजूद यह वबाएँ और बलाऐं दफा नहीं हुई। मगर जब सदकात किये गये तो अरहमुर राहेमीन का ऐसा रहम व करम जाहिर हुआ कि देखते देखते एक दम यह सारी वबाएँ और बलाएँ दूर हो गई। क्यों न हो कि सारी बलाओ और वबाओं और मुश्किलात का सबब खुदावन्द कुद्दूस का कहर व गजब ही है और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशादे गिरामी है कि " अस्सदकतो तुतफी गदाबर रब" यानी सदके से खुदा के गज़ब की आग बुझ जाती है। यानी बन्दों के सदका करने से खुसूसन छुपा कर सदका देने से खुदावन्द कुद्दूस अपने कहरो जलाल को जाहिर फरमाने के बजाए खुश होकर अपने-रहमो करम की तजल्ली फरमाता है और उसके रहमो करम का जुहूर होते ही सारी बलाएँ और वबाएँ दूर हो जाती हैं। वल्लाहु तआला अअलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 35,36)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣1️⃣*

*📑हज़रत हकीम बिन हिज़ाम का जज़्बए इबादत*

📝हदीस :- हज़रत हकीम बिन हुजाम रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि मैंने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! कुछ चीजें(नेकी की) मैं जाहिलियत में किया करता था। तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि तुम इन कामों के ऊपर मुसलमान हुए जो नेकी के काम तुमने पहले किये थे। तो मैंने कहा कि खुदा की कसम जाहिलियत में जो नेकी के काम मैंने किये थे। इस्लाम में उन में से इक को भी नहीं छोडूंगा।

*⚡हकीम बिन हिज़ाम* :- इस हदीस के रावी हज़रत हकीम बिन हिज़ाम सहाबी हैं उनकी कुन्नियत अबू ख़ालिद है। यह उम्मुल मोमिनीन हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा के भतीजे हैं। हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु की तरह बीच ख़ानए काबा में पैदा हुए थे। असहाबे फील के वाकिये से तेरह साल बाद इन की पैदाइश हुई। जमानए जाहिलियत और दौरे इस्लाम दोनों ज़मानों में इनका शुमार अशराफ व सरदाराने कुरैश में रहा। फतह मक्का के दिन 8 हिजरी में मुसलमान हुए।बहुत ही अक्लमन्द व परहेज़गार इन्तिहाई फाजिल व दीनदार थे। ज़मानऐ जाहिलियत में भी इबादत के तौर पर एक सौ गुलामों को आज़ाद किया।और इस्लाम लाने के बाद जब यह हज को गये तो कुरबानी के लिए एक सौ ऊँटों को इस शान से हमराह ले गये कि हर ऊँट को धारी दार कपड़े
का झोल पहनाए हुए थे। और एक हज़ार बकरियाँ भी कुरबानी के लिए मिना की कुरबान गाह में लाए थे। और मैदाने अरफात में उनके साथ उनकी एक सौ बान्दियाँ थी। जिन के गले में चाँदी के तौक थे। और उन पर यह इबारत के नक्श की हुई थी कि " उत्का उल्लाहे अन हकीम बिन हिज़ाम' यानी यह सब अल्लाह तआला के लिए आज़ाद हैं और उनको आजाद करने वाला हकीम इब्ने हिज़ाम है। मक्का मुकर्रमा दारुन नदवा जो ज़मानए जाहिलियत में कुरैश का पार्लियामेन्ट हाऊस था उन्हीं की मिलकियत में था। जिसको उन्होंने हज़रत अमीरे मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु के हाथ एक सौ दिरहम में फरोख्त  किया। तो हजरत इब्ने जुबैर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा ने फरमाया कि अफसोस! तुमने कुरैश की एक इज्जत को बेच दिया। तो आपने फरमाया कि जहबतिल मकारिमो इल्लत तकवा" यानी इस्लाम में तकया के सिवा सब एजाज़ और इज़्ज़ते खत्म हो गई।54 हिजरी में आप ने मदीना मुनव्वरा के अन्दर वफात पाई।

*📑तशरीह* :मुहक्केकीन शारेह हदीस के नज़दीक इस हदीस का मतलब यह है कि कुफ़्र की हालत में अगर किसी ने नेक काम किया और फिर वह मुसलमान हो गया। और इस्लाम ही पर उसका खात्मा हो गया  तो कुफ़्र और इस्लाम के दोनों ज़मानों में जो नेकी के काम किये सबका सवाब उसको मिलेगा हज़रत हकीम बिन हिज़ाम रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जबाने मुबारक से यह बशारत सुनकर एक सौ गुलामों को आजाद किया। और एक सौ ऊँट मिसकीनों की सवारी के लिए बतौर सदका के मरहमत कर दिये। क्योंकि वह जमानए जाहिलियत मे इतने ही गुलामों को आजाद और इतने ही ऊँट खैरात कर चुके थे। हजरत हकीम बिन हिज़ाम रदियल्लाहु तआला अन्हु का यह जज्बए इबादत हर मुसलमान के लिए काबिले तकलीद है। काश हम मुसलमानों को उन मुकद्दस सहाबाए किराम के तरीकए अमल और जज्बए इबादत की तौफीक नसीब हो। वल्लाहु तआला अअलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 37,38)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣2️⃣*

             *💎दुरुदो सलाम*

💫दुरुद शरीफ पढ़ना बेहतरीन इबादत है। अल्लाह तबारक व तआला का इरशाद है कि “ इन्नल लाहा व मलाऐकतोहु युसल्लूना अलन नबी, या अय्योहल लजीना आमनू सल्लू अलैहि वसल्लेमु तस्लीमा। यानी बेशक अल्लाह और उसके तमाम फरिश्ते दुरुद भेजते हैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर। ऐ ईमान वालो तुम भी दुरुद भेजो उन पर और सलाम भेजो जैसा कि सलाम भेजने का हक है।इस आयते करीमा में युसल्लूना(दुरुद भेजते हैं) की तफसीर में हज़रत अल्लामा मुल्ला अहमद जीवन (उस्ताद आलमगीर बादशाह) रहमतुल्लाह तआला अलैह ने तहरीर फरमाया कि बेशक अल्लाह और उसके फरिश्ते हुजूर की शान बढ़ाने का एहतिमाम करते हैं तो ऐ ईमान वालो तुम लोग भी हुजूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम की शान बढ़ाने में एहतिमाम करो।इस आयत में अल्लाह तआला के दुरुद भेजने का मतलब है कि अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर रहमतें नाजिल फरमाता है। और उनके दरजात को बुलन्द से बुलन्द तर फरमाता है और फ़रिश्तों के दुरुद भेजने से यह मुराद है कि यह लोग हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत के लिए मगफिरत माँगते हैं। और मोमिनीन के दुरुद भेजने के यह माने हैं कि यह लोग हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बुलन्द मरातिब व दरजात और उन पर रहमते इलाही के नुजूल की दुआएं करते हैं।आयते करीमा और उसकी तफसीर से जाहिर हो गया कि जनाब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अज़मते शान और उनके दरजात व मरातिब का बयान खुदावन्द कुद्दूस का खुतबा और फरिश्तों का मुकद्दस वजीफा है। और मोमिनीन का बकमाले ताकीद हज़रत हक जल्ल जलालुहू ने दुरुद व सलाम भेज कर हुजूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम की अज़मते शान का एहतिमाम करने का हुक्म फरमाया है। इससे जाहिर हुआ कि दुरुद शरीफ कितनी अज़ीमुश्शान इबादत है।बिलाशुबा इस आयते करीमा से साबित होता है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दुरुद व सलाम भेजना फर्ज है। चुनाँचे अक्सर उल्माएं किराम का यही कौल है कि जिस तरह कलिमए शहादत पढ़ना सारी उम्र भर में एक बार फर्ज़ है उसी तरह दरुद व सलाम भी तमाम में एक बार पढ़ना फर्ज है। और शिफा शरीफ़ में काजी अबूबक्र का यह कौल मनकूल है कि अल्लाह तआला ने हुजूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम पर दुरुद व सलाम पढ़ने को तमाम ईमान वालों पर फर्ज फरमा दिया है। और कोई वक्त और तादाद मुकर्रर नहीं फरमायी है। और इमाम करनी ने फरमाया कि जब जब और जितनी बार हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नाम आये तो हर मरतबा दुरुद व सलाम पढ़ना वाजिब है बहर हाल हर मोमिन को चाहिये कि बकसरत दुरुद व सलाम पढ़ता रहे। और हरगिज़ हरगिज इस मुकद्दस वज़ीफे से गाफिल न रहे।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 38,39)*
*➡️जारी है* 
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣3️⃣*

*📿दरूदो सलाम*

💎दरूद शरीफ के बारे मे ब कसरत अहादीसे मुबारका में ताकीदे और तरह तरह की फजीलतें और बशारतें वारिद हुई है। हम इस खुसूस में चन्द आहादीसे करीमा नकल करते हैं। खुदावन्द कुददूस हम को और तमाम मुसलमानों को दुरुद व सलाम पढ़ने की तौफीक और उसके फज़ाइल व बरकात की दौलतों से मालामाल फरमाये। आमीन।

*हदीस (1)* हजरत अबूहुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो मुझ पर एक बार दुरुद भेजेगा अल्लाह तआला उस पर दस बार रहमतें नाज़िल फ़रमायेगा। अल्लाहु अकबर! कैसा बुलन्द मरतबा है दुरुद शरीफ पढ़ने वाले का कि एक बार दुरुद शरीफ़ पढ़ने वाले मुसलमान पर दस मरतबा अल्लाह तआला अपनी रहमतें नाज़िल फरमाता है।

*हदीस (2)* हज़रत अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो मुझ पर एक मरतबा दुरुदं शरीफ भेजेगा। अल्लाह तआला उस पर दस रहमतें नाज़िल फरमायेगा। और उसके दस गुनाह माफ़ हो जायेंगे। और उसके दस दरजात बुलन्द कर दिये जायेंगे।

*हदीस (3)* हज़रत इने मसऊद रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि कयामत के दिन तमाम लोगों में सब से ज़्यादा मेरे करीब वह शख्स होगा जो सब से ज्यादा मुझ पर दुरुद शरीफ पढ़ता होगा।

*📝कुरवे दरबारे नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम*

सुब्हानल्लाह ! अहले ज़ौक के नज़दीक दुरुद शरीफ के फजाइल में इस हदीस् कि मिस्ल दूसरी हदीस् नहीं है क्योंकि रमूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कुर्ब से बढ़कर मुसलमान के लिए कोई दूसरी फजीलत नहीं। कौन नहीं जानता कि मोमिन के तमाम कमालात व दरजात और दुनिया वा अखिरत की सारी तरक्की यात का दारो मदार दरबारे नबवी का कुर्ब ही है। जो मुसलमान जिस कदर बारगाहे नुबुव्वत में मुकर्रब होगा उसी कद्र फजीलत व अज़मत की मेअराज उसको हासिल होगी। क्योंकि जो शख्स हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जितना ज़्यादा कुर्ब हासिल करेगा उतना ही ज्यादा खुदाऐ तआला का मुकर्रब बन्दा होगा। और जो मुसलमान खुदावन्द् कुददूस. का मुकर्रब हो जाएगा उसको कौन सी
बुजुर्गी और फजीलत व अज़मत मेअराज न हासिल होगी
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 40,41)*
*➡️ जारी है*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣4️⃣*
         *🏵️दरूदो सलाम* 

*💫हदीस (4)* और इन्ही इब्ने मसऊद रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह के कुछ ऐसे फरिश्ते हैं जो ज़मीन में सैर फरमाते रहते हैं और मेरी उम्मत का सलाम मेरे पास पहुँचाते रहते हैं।

*💎सआदतों के बादशाह :-* अल्लाहु अकबर! बारगाहे रिसालत में सलाम का नज़राना पेश करने वाले मुसलमान कितने खुशनसीब और सआदतों के बादशाह बल्कि शहंशाह हैं कि वह जहाँ से भी जिस जगह से भी और जितनी मरतबा भी बारगाहे अकदस में सलाम पढ़ते हैं उनका हर हर सलाम खुदा के फरिश्ते बसद इज्जत व एहतिराम अपने साथ लेकर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरबार में हाजिर होते हैं। और इस तरह अर्ज करते हैं कि या रसूलल्लाह ! आपके उम्मती जिसका फलाँ  नाम है और उसके बाप का फलाँ नाम है उसने फलाँ जगह से इतनी इतनी बार सलाम पढ़ा है। अल्लाहु अकबर! सलाम पढ़ने वाले का नाम फरिश्तों की जबान से दरबारे रिसालत में जिक्र किया जाए और रहमते आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने गोशे मुबारक से इस तरह समाअत फरमायें। ज़रा सोचिए तो सही कि उस मुसलमान का खुश नसीबी और सआदत का मुकाम कितना बुलन्द होगा?

*💫हदीस (5)* हज़रत अबी बिन कब रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है उन्होनें कहा कि मैं ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह ! मैं बकसरत आप पर दुरुद शरीफ पढ़ता हूँ तो कितना वक्त मैं आप पर दुरुद शरीफ पढ़ने के लिए मुकरर्र करलूँ? तो आप ने फरमाया कि तुम जिस कदर चाहो। तो मैंने कहा कि दिन का चौथाई हिस्सा ? तो आप ने फरमाया कि तुम जिस कदर चाहो। अगर ज्यादा करोगे तो बेहतर ही होगा। तो मैं ने कहा दिन का आधा हिस्सा? तो फ़रमाया कि जिस कदर चाहो अगर तुम ज्यादा करोगे तो तुम्हारे लिए बेहतर ही होगा। तो मैंने कहा कि दिन का दो तिहाई हिस्सा?
तो आपने फरमाया कि तुम जिस कदर चाहो। अगर तुम ज़्यादा करोगे तो तुम्हारे लिए बेहतर होगा। तो मैंने कहा कि पूरा दिन भर मैं आप पर दुरुद पढ़ने ही के लिए मुकर्रर कर दूँ? तो आप ने फरमाया कि जब तो तुम्हारे मकासिद के हुसूल के लिए यही काफी हो जाएगा। और तमाम गुनाहों की मगफिरत हो जाएगी
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 41,42)*
*➡️जारी है* 
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣5️⃣*
          *⚡दरूदो सलाम* 

*⚡हाजत रवाई और मगफिरत की गारण्टी*
 इस हदीस में निहायत वजाहत के साथ यह तसरीह है कि अगर कोई मुसलमान अपने तमाम वजाइफ व औराद को मौकूफ करके दिन रात के पूरे औकात में  सिर्फ दुरुद शरीफ ही पढता रहे। तो उसको कोई फिक्र लाहिक ही नहीं होगी। और उसके तमाम मकासिद हासिल और उसकी तमाम मुरादें और तमन्नाएं पूरी हो जायेंगी। और उसके तमाम गुनाह भी मुआफ हो जायेंगे। तो मालूम हुआ कि  दुरुद शरीफ पढ़ना दूसरे और वज़ाइफ से अफजल है। क्योंकि दुरुद शरीफ पढ़ने के यह दोनों फाइदे किसी दूसरे वजीफा के बारे में बयान नही किये गये हैं। लिहाजा इन फवाइद के लिहाज़ और इन खुसूसियात की वजह से बिला शुबाह दुरुद तमाम दूसरे औराद वज़ाइफ़ से अफज़ल व आला है। वल्लाहु तआला अअलम।

*💎हदीस* :- हजरत अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल जाए जिसके पास मेरा ज़िक्र हो और उसने मुझपर दुरुद शरीफ नहीं पढ़ा। और उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल जाए कि उस शख्स की मगफिरत होने से पहले ही रमजान गुज़र गया। और उस आदमी की नाक भी मिट्टी में मिल जाए कि उसके पास उसके वालिदैन या दोनों में से एक बुढ़ापे को पहुंचे और वालिदैन की रज़ा जोई और खिदमत गुजारी ने उस आदमी को जन्नत में नही दाखिल किया।

*👤तीन बद नसीब आदमी* 
 हदीस मजकूरा बाला में हूजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन मनहूस और बदबख्त इन्सानों का जिक्र फरमाकर उनकी जिल्लत व ख्वारी का ऐलान और उनकी हिरमाँ नसीबी और बदबख्ती का बयान फरमाया है जो हस्बे जैल है:

*(1)* यह शख्स कि उसके सामने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नाम लिया गया या आप का ज़िके जमील किया गया और उसने सुनकर दुरुदो सलाम नहीं पढ़ा।

*(2)* वह शख्स कि उसे रमजान शरीफ का महीना मिला। और उसने रोज़ा रखकर तरह तरह के दूसरे आमाले सॉलेहा करके अपने जन्नत मे जाने का सामान नहीं किया। और रमजान शरीफ का महीना यूँ ही उसकी गफलत व लापरवाही में 
गुजर गया
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 42,43)*
*➡️जारी है* 
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            
           *💎दरूदो सलाम* 
*📝(3)* वह शख्स कि उसने अपने माँ बाप या उन दोनों में से एक को बुढ़ापे की हालत में पाया। और वह उन की रजा जोई और ख़िदमत गुजारी करके जन्नती न बन सका। मजकूरा बाला इन तीनों बद नसीबों के लिए इरशाद हुआ कि "रगिम अनफहू" यानी उन सभों की नाक मिट्टी में मिल जाए। या इन सभों की नाक मिट्टी में मिल गई। नाक के मिट्टी में मिल जाने का मतलब यह है कि यह लोग ज़लील व. खुवार खाइब व खासिर हो जायें। या ज़लील व खुवार हो गये। रगिम अन्फहु' जुमला दुआईया भी हो सकता है और जुमला खबरिया भी बहर हाल इन तीनों को हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नामुराद व खाइब व खासिर फरमाते हुए इन तीनों बद नसीबों से बेज़ार और नाराज़गी का ऐलान फरमाया है।

💫हदीस  हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि उन्होनें कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि बहुत बडा बखील है वह शख्स कि उसके पास मेरा जिक्र किया गया और उसने मुझ पर दुरुद शरीफ नहीं पढ़ा। इस हदीस को तिरमिजी ने रिवायत किया है। साहिबे मिरकात ने इस हदीस में फरमाया कि " अलबखीलु" पर  अलिफ लाम तारीफ जिन्स के लिए है जिससे मुराद कामिल दरजे का बखील है और "मन" से पहले " अल्लज़ी" इस्मे मौसूल जाइद है जो ताकीद के लिए है। साहिबे मिरकात की इस तशरीह की रौशनी में हदीसे मजकूरा का मतलब यह हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्र सुनकर जो दुरुद शरीफ न पढ़े यह यकीनन और बिला शुबा बहुत बड़ा बखील है।

💎हदीस  हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि उन्होनें कहा कि हर दुआ आसमानों जमीन के दरमियान रुकी रहती है और मुकामें मकबूलियत में चढ़ती ही नहीं जब तक कि तुम अपने नबी पर दुरुद न पढ़ों।इस हदीस का हासिले मतलब यह है कि दरुद शरीफ दुआओं की मकबूलियत का बेहतरीन ज़रीआ और आला दरजे का वसीला है। 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 43,44)*
*➡️ जारी है* 
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣7️⃣*

*📑कहाँ कहाँ दुरुद शरीफ पढ़ना अफज़ल है* 

💎यूँ तो हर जगह और हर हाल में दुरुद व सलाम की कसरत ही बेहतर है लेकिन मोतबर रिवायतों के मुताबिक चौबीस मुकामात पर दुरुद व सलाम पर पढ़ना बाइसे फजीलत व मूजिबे खैर व बरकत है बल्कि उसकी ताकीद भी आयी है। जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नामे नामी जबान पर लाएं या सुनें । चुनाँचे असहाब व ताबेईन व जमीअ अइम्मा मुहद्देसीन व उल्माए सॉलेहीन का हमेशा यही दस्तूर रहा है कि यह कभी इस्मे मुबारक बगैर सलातो व सलाम के नहीं ज़िक्र करते। इसी तरह जब जब इस्मे मुबारक लिखें तो दुरुद व सलाम ज़रुर लिखें। जब तक तहरीर में इस्मे मुबारक बाकी रहेगा फरिश्ते लिखने वाले पर दुरुद व सलाम भेजते रहेगें। मशहूर जलीलुल कदर मुहद्दिस हज़रत अबू जरआ रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने एक शख्स को उसकी वफ़ात के बाद खवाब में देखा कि वह आसमान में फरिश्तों के साथ नमाज़ पढ़ता है। आपने उससे पूछा कि तुम को यह दरजा किस नेकी की वजह से मिला? तो उसने कहा कि मैंने दस लाख हदीसें अपने हाथ से लिखीं हैं। और जब भी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नाम आता था तो मैं दुरुद शरीफ ज़रुर लिखता था। इसी वजह से मुझको यह रुतबा बुलन्द मिला। इसका ख्याल रहे कि हमेशा " सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पूरा लिखे। सिर्फ सुआद या सलअम पर हरगिज़ हरगिज इक्तिफा न करें। मोतबर उल्माए किराम से मनकूल है कि एक शख्स हदीसें लिखता था और नाम मुबारक के साथ कागज बचाने के लिए अपनी बखीली के सबब दुरुद शरीफ नहीं लिखता था। तो उसके हाथ में कैन्सर हो गया। और उसका हाथ गल सड़ कर गिर गया। इसी तरह मन्कूल है कि सबसे पहले जिस शख्स ने दुरुद शरीफ के बदले सुआद या सलअम का बुरा दस्तूर निकाल मुफ्तियाने किराम ने फतवा दिया कि उस बद नसीब का हाथ काटा जाए हर सुबह व शाम दुरुद शरीफ ज़रुर पढ़ना चाहिये तिबरानी की रिवायत है कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो रोजाना सुबह व शाम दस बार दुरुद शरीफ पढ़े तो उसको मेरी शफाअत नसीब होगी। जब किसी मजलिस में आदमी दाखिल हों तो उस मजलिस से उठने से पहले जरुर दुरुद शरीफ़ पढ़ले दुआ से पहले और दुआ के दरमियान में दुआ के आखिर में दुरुद शरीफ पढ़ना चाहिए मस्जिद मे दाखिल होते वक़्त और मस्जिद से निकलते वक्त। अज़ान के बाद। वजू के वक्त।किसी चीज़ को भूल जाए। इन्शा अल्लाह यह चीज़ मिल जाएगी। हज में लब्बैक पढ़ने के बाद। कबरे मुनव्वर की जियारत के वक्त  बल्कि जब मदीना मुनव्वरा।का सफर करे तो पूरे रास्ते में दुरुद शरीफ़ बकसरत पड़े।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 45,46)*
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🇮🇳"सिराते मुस्तक़ीम ग्रुप:
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣8️⃣*

*🌹दुरुद शरीफ के रंग में रंग जाओ*

 💫हज़रत शैख़ अब्दुल हक मुहदिस देहलवी ने तर्जुमा मिश्कात में जिक्र किया है कि जब मैं सफरे मदीना मुनव्वरा को कब्रे अनवर की जियारत के कस्द से रवाना हुआ तो हज़रत शैख़ अब्दुल वहहाय मुत्त्तकी रहमतुल्लाह तआला अलैहि ने ब वक्ते रुखसत फरमाया कि तुम यकीन रखो कि इस राह के बाद फ़राइज़ के कोई इबादत भी दुरुद शरीफ के मिस्ल नहीं है। तो मैंने कहा कि कितनी तादाद में दुरुद शरीफ पढ़ता रहूँ। तो उन्होनें फरमाया कि कोई अदद मोअय्यन नहीं है इस कदर ज़्यादा पढ़ों कि इसी में मुसतगरक हो जाओ। और दुरुद शरीफ के रंग में रंगे हुए बन जाओ।जब कान बोलें। यानी जब कान में सनसनाहट या भनभनाहट पैदा हो तो दुरुद शरीफ पढ़े। इब्ने सुन्नी ने रिवायत किया है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब तुम्हारा कान बोले तो मुझ पर दुरुद शरीफ़ पढ़ो अल्लाह तुम पर अपनी रहमत नाजिल फरमाएगा जुमा के दिन बकसरत दुरुद शरीफ पढ़े। और अबू नोएम ने हिलया में रिवायत की है।

        *अजीमुश्शान नूर*  
🏵️कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स जुमा के दिन सौ बार दुरुद शरीफ पड़ेगा वह कयामत के दिन ऐसा नूर लेकर आयेगा जो अगर सारी मखलूकात पर तकसीम किया जाए तो सबको नूरानी बना देगा।

*अस्सी बरस के गुनाह माफ* 
💎और दैलमी की रिवायत में है कि जो शख्स जुमा के दिन सौ बार दुरुद  शरीफ पढ़े उसके अस्सी बरस के गुनाह बख्श दिये जायेंगे जुमा की रात में दुरुद शरीफ पढ़ना भी बहुत अफजल है माह रबीउल अव्वल में और दो शुम्बा के दिन और बिलखुसूस विलादत के दिन बारह रबीउल अव्वल में खास कर महफिले मीलाद शरीफ में बकसरत दुरुद व सलाम पढ़े। इस वास्ते कि यह महीना और दो शम्बा का दिन विलादते शरीफा की तारीख इन सब को जाते वा बरकत से गहरा तअल्लुक है। और हर वह चीज जिस को आप की मुकददस जात से निस्बत व तअल्लुक हासिल हो उस को पा लेने के वक्त दुरुद शरीफ पढ़ना मुस्तहब और सल्फ़ व सॉलेहीन का तरीक है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 46,47)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 1️⃣9️⃣*

*💐दरूद शरीफ के रंग में रंग जाओ*

💫हजरत शाह वली उल्लाह मुहददिस देहलवी रहमतुल्लाह तआला अलैहि ने अपनी किताब फुयूजुल हरमैन' में लिखा है कि मैं मक्का मुअज्जमा में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विलादत शरीफ के मकान में 12 रबीउल अव्वल को विलादत शरीफ़ की मजलिस में हाजिर था। आप का जिक्रे जमील हो रहा था। लोग दुरुद शरीफ़ पढ़ रहे थे। तो मैंने देखा कि अचानक अनवार बुलन्द हुए जब मैनें उन अनवार को गौर से देखा तो यह फरिश्तों और रहमते इलाही के मिले जुले अनवार थे किताबों और रिसालों की इब्तिदा में बिस्मिल्लाह और हम्द के बाद दुरुद शरीफ़ लिखना मुस्तहब है और किताब व रसाइल के आखिर मे दुरुद शरीफ लिखना सल्फ व सॉलेहीन का तरीका है।नमाजे जनाज़ा में " अत्तहियात' के बाद दुरुद शरीफ पढना हन्फिया के नज़दीक सुन्नत और इमाम शाफेई के नजदीक फर्ज है। हर नमाज में दूसरी तकबीर के बाद खुत्बए जुमा में इमाम शाफेई के नजदीक दुरुद शरीफ फर्ज है और हन्फिया के नजदीक मुस्तहब है। बहर हाल लाजिम है कि कोई खुत्बा जुमा दुरुद शरीफ से खाली न हो। खुत्बए निकाह और दर्से इल्म और वअज की इब्तिदा में भी दुरुद शरीफ पढ़ लेना मुस्तहब और बाइसे खैरोबरकत है कुरआन मजीद खत्म करे तो दुरुद शरीफ जरुर पढ़ले कि यह नुजूले रहमत और दुआ की मकबूलियत का वक्त है। रात को नमाजे तहज्जुद के लिए बेदार होते वक्त ।आँधी ज़लज़ला वबाओं वगैरह बलाओं को दफा करने के लिए बकसरत दुरुद शरीफ पढ़ना निहायत मुफीद है। इत्र या गुलाब या किसी खुश्बू को सूंघने के वक्त में दुरुद शरीफ पढ़ना चाहिये। हजरत शैख अब्दुल हक मुहदिस देहलवी रहमतुल्लाह तआला अलैहि ने लिखा है कि खुश्बू सूंघते वक्त खुश्बूए मुहम्मदी को याद करके दुरुद व सलाम का तोहफा पेश करें तो यह मुस्तहसन है 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा,47 ,48)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣0️⃣*

*🌷दुरुद शरीफ पढ़ने वालों की चन्द हिकायात*

💫हज़रत इमाम शाफेई रहमतुल्लाह तआला अलैहि की वफात के बाद किसी बुजुर्ग ने उनको ख्वाब में देखा और पूछा कि आपके साथ अल्लाह तआला ने क्या मामला फरमाया? तो उन्होनें फरमाया कि मुझे अल्लाह तआला ने बख्श दिया। बुजुर्ग ने दरयाफ्त फरमाया कि मगफिरत किस नेकी के सबब हुई? तो उन्होंने फरमाया कि इन पाँच दुरुदों के सबब जिन को मैं पढ़ा करता था। मेरी बखिशश हो गई। वह पाँचो दुरुद यह हैं।

*(1)* अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन बेअददि मन सल्ला अलैहि। *(2)* अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन बेअददि मन ला युसल्ले अलैहि । *(3)* अल्ला हुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन कमा अमरता बिस्सलाति अलैहि। *(4)* अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मदिन कमा तुहिब्बो अन तसल्ला अलैहि। *(5)* अल्लाहुम्मा सत्ले अला मुहम्मदिन कमा यमबगी अन युसल्ला अलैहि।

⚡मशहूर मुहदिस उबैदुल्लाह बिन उमर कवारीरी ने बयान किया कि एक कातिब जो मेरा हमसाया था उसकी मौत के बाद उसे मैने ख्वाब में देख कर पूछा कि तेरा अन्जाम क्या हुआ ? तो उसने कहा कि मैं इस वजह से बखा दिया गया कि उम्र भर मेरी यह आदत रही कि जब हूजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नामे नामी मैं किताब में लिखता तो सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम" भी लिखता था। और ज़बान से कहता भी था। तो मुझे अल्लाह तआला ने ऐसी नेअमतें दी हैं कि उनको न किसी आँख ने देखा न किसी कान ने सुना न किसी के दिल में यह ख्याल आया शैख़ इब्ने हजर मक्की रहमतुल्लाहि तआला अलैहि ने लिखा है कि एक मर्द सॉलेह हर रात सोते वक्त दुरुद शरीफ पढ़ते पढ़ते सो जाता था। उसने एक रात ख्वाब में देखा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ख्वाब में तशरीफ़ लाए और उसके रुखसार को बोसा दिया। जब उसकी आँख खुली तो सारे घर में मुश्क से बेहतर खुश्बू फैली हुई थी। और एक हफ्ता तक उसके रुखसार में मुश्क से बढ़ कर खुश्बू बाकी रही। एक मर्द सॉलेह ब कसरत दुरुद शरीफ पढ़ने में मशगूल रहते थे लोगों ने उनकी वफात के वक्त देखा कि रुह निकलने के वक्त उनकी पेशानी पर नूर के सितारे चमकने लगे।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 48,49)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣1️⃣*

*🏵️दरूद शरीफ पढनें वालों की चन्द हिकायात*

💎अल्लामा फाकेहानी ने “फजरे मुनीर' में लिखा कि शैख सॉलेह हज़रत मूसा जरीर ने जिक्र किया कि वह समुन्दर में जहाज़ पर सवार थे एक तूफानी हवा इस किस्म की उठी कि जहाज़ ऐसी हवा में डूबने से कम बचता है तामाम मुसाफिर परेशान थे नागहाँ मुझ पर नींद का गलया हुआ और मैं सो गया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देखा कि आप फरमाते हैं कि जहाज वालों से कह दो कि हज़ार बार दुरुद शरीफ पढ़ें। चुनाँचे मैंने बेदार होकर लोगों से अपना ख्वाब बयान किया और लोगों ने दुरुद शरीफ़ पढ़ना शुरु किया। तीन सौ की तादाद में लोग दुरुद शरीफ पढ़ चुके थे कि तूफान की बला दूर हो गई और वह दुरुद शरीफ यह है।

*अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्येदिना मुहम्मदिन व अला आले सय्येदिना मुहम्मदिन सलातन तुनजजीना बिहा मिन जमीइल अहवाले बल आफात. व तकदी लना बिहा जमीइल हाजात, व तुताहिरोना बिहा मिन जमीइस सय्येआत, व तरफओना बिहा इन्दका अअलद दराजात, व तुबल्लेगुना बिहा अकसल गायात, मिन जमीइल खैराते. फिल हयाते व बअदल ममात*

💫हज़रत शैख़ अल्लामा अब्दुल हक मुहदिदस देहलवी रहमतुल्लाह अलैहि ने लिखा कि जो शख्स सोते वक्त चन्द बार इस दुरुद शरीफ को पढ़े और पढ़ते हुए सो जाए तो उसको ख्वाब में रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का दीदार नसीब होगा। बहुत से बुजुर्गों का तजुर्बा है ओर शैख रहमतुल्लाहि तआला अलैहि ने भी इसको मुजर्रब लिखा है। दुरुद शरीफ यह है : *अल्लाहुम्मा रब्बल हिल्ले वल हराम व रब्बल मशअरिल हरामे व रब्बल वैयतिल हरामे व रब्ब र्रूकने वल मुकाम अबलिग लेरुहे सय्येदिना व मौलाना मुहम्मदिन मिन्नियस सलाम । वल्लाहु तआला अअलम।*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 49,50)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*💎दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣2️⃣*

*🌴दरख्त लगाने और खेती करने का सवाब*

*💫हदीस :-* अनस बिन मालिक से मरवी है उन्होंने कहा कि फमाया नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कि जो मुसलमान भी कोई दरख्त लगाएगा या कोई खेती करेगा तो उस दरख्त या खेती से जितने परिन्दे या जितने इन्सान या चरिन्दे खा लेंगे वह सब उस मुसलमान की तरफ से सदका होगा।

*📝फवाइद व मसाइल :-* दरख्तों के फल और खेतों के दाने आम तौर पर चरिन्दे और परिन्दे बल्कि बाज़ इन्सान भी खा लिया करते हैं। जाहिर है कि उस दरख्त से और खेतों के मालिक को नुकसान होता है जिससे उसको तकलीफ होती है। मगर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इस इरशादे गिरामी से यह हिदायत की रौशनी मिलती है कि दरख्त और खेत के मालिक को उससे नाराज़ नहीं होना चाहिये। और यह नहीं समझना चाहिये कि मेरे फल और खेत के दाने रायेगाँ और बरबाद हो गये। बल्कि उसको यह ईमान रखना चाहिये कि जितने फल परिन्दों और चरिन्दों ने खा लिए और जितने दाने चुग लिए या इन्सानों ने उसकी इजाजत के बगैर खा लिए अगरचे इन वे इजाज़त खाने वालों ने चोरी का गुनाह अपने सर लिया मगर दरख्त और खेत के मालिक को सदका करने का सवाब मिलेगा। लिहाजा उसको चाहिये कि अजरो सवाब मिलने की उम्मीद रखे और रंज व मलाल न रखे। बल्कि सब्र के साथ खुदा का शुक्र अदा करे कि बगैर मेरे सदका देने के यह फल और दाने मेरी तरफ से सदका बन गये। और खुदा से उम्मीद रखे कि मेरे फलों ओर दानों में यकीनन बरकत होगी। क्योंकि जिस माल में से सदका दे दिया जाता है जरुर उस माल में बरकत हो जाया करती है। लिहाजा यकीन रखना चाहिये कि जिस दरख्त और खेत में से चरिन्दे और परिन्दे और इन्सान का खा लेंगें तो अल्लाह तआला जरुर उन
दरख्त के फलों और इस हदीस से बाज़ उल्मा ने यह मसला निकाला है कि तमाम कमाईयों में से बेहतर हाथ की कारीगरी है और अक्सर उल्मा ने यह तहरीर फरमाया कि सब से अफजल कमाई तिजारत है। लेकिन ज्यादातर हदीसों से यही रौशनी मिलती है कि सब से अफजल व आला कमाई हाथों की कारीगरी है। वल्लाहो तआला अअलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 50,51)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
          *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣3️⃣*

*✨मरते ही जन्नत में दाखिल हो जायेगा*

💦हदीस :- हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि मैंने मिम्बर पर रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को यह फरमाते हुए सुना है कि जो शख़्स हर नमाज़ के बाद आयतल कुर्सी पढ़ेगा वह मरते ही जन्नत में दाखिल हो जायेगा। और जो अपने बिस्तर पर लेटते वक्त आयतल कुर्सी पढ़ लेगा तो अल्लाह तआला उसके घर और उसके पड़ोसी के घर और उसके गिर्द के चन्द घरों को अमनो अमान अता फरमायेगा।

*📜तबसरा :-* सुल्हानल्लाह आयतल कुर्सी पढ़ने के सवाब का क्या कहना ?वह अमल है कि अगर मकबूल हो जाए तो उस पर अमल करने वाले को मरते ही खुदावन्द कुद्दूस अपने फ़ज़लो करम से दुखूले जन्नत की करामतों से सरफ़राज़ फरमा देगा। गौर कीजिए कि कितनी मुख़्तसर इबादत पर कितने अज़ीम सवाब का खुदावन्द आलम वादा फरमा रहा है। यह उसका फजले अज़ीम ही तो है। अल्लाहु अकबर। बहर हाल ईमाने कामिल और एतिकादे रासिख़ के साथ इस अमल पर कारबन्द होकर इसकी मनफअतों और बरकतों से फैज़याब होना हर मुसलमान मर्द और औरत के लिए बहुत बडी सआदत है। खुदावन्द करीम सब को अमल की तौफीक अता फरमाये। आमीन।

*अल्लाह तआला की हिफाज़त में*
 💎एक हदीस में यह भी आया है कि हुजूर सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स सूरए मोमिन में से " हा मीम से इलैहिल मसीर" तक और आयतल कुर्सी सुबह को पढ़ ले तो शाम तक वह इन आयतों को पढ़ने के सबब से खुदावन्द करीम की हिफाजत में रहेगा। और जो शाम को इन दोनों आयतों को पढ़ ले तो वह सुबह तक अल्लाह तआला की हिफाज़त में रहे खुलासा यह है कि आयतल कुर्सी को पढ़ना उसमें दीन व दुनिया के बहुत ज़्यादा फवाइद व मुनाफेअ हैं लिहाज़ा हर मुसलमान को चाहिये कि इसको याद करे और बकसरत पढ़ा करे ख़ास कर पाँचों नमाज़ों के बाद और बाद नमाज़े फजर, व बाद नमाजे मगरिब इस को जरुर पढ़ लिया करो और जब सोने के लिए बिस्तर पर लेटे तो एक मरतबा ज़रुर पढ़ ले। इन्शा अल्लाह तआला वह और उसके पडोसी चोरों से अमनो अमान में रहेंगे। और उसको बहुत ज़्यादा बरकतें हासिल होगी।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 51,52)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣4️⃣*

         *📜हदीसुल गार*

✨हदीस :- हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा रावी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तीन आदमी सफर में पैदल चल रहे थे। कि बारिश होने लगी। तो यह लोग एक गार में घुस गये तो पहाड़ की एक चट्टान गिर कर गार के मुँह पर आ गई। और उन लोगो को ढाँप लिया। तो उन लोगो ने आपस में एक दूसरे से कहा लोग गौर करो कि अगर तुम ने कोई नेक अमल किया हो तो उसको वसीला बना कर दुआ माँगो। शायद अल्लाह तआला गार का मुँह खोल दे। और हम लोंगो को निजात मिल जाए। तो उन में से एक ने कहा कि ऐ अल्लाह मेरे माँ बाप बहुत बूढ़े थे और मेरे छोटे छोटे चन्द बच्चे भी थे और मैं दिन भर मवेशी चराता था और शाम को जब घर लौटता और दूध दूहता तो अपने माँ बाप को अपने बच्चों से पहले पिलाता था। एक दिन मुझे घर आने में कुछ देर हो गई और रात को आया तो मेरे वालिदैन सो गये थे। तो मै दूध लेकर उन दोनों के सरहाने खड़ा हो गया और उन दोनों का जगाना पसन्द नही किया और मेरे बच्चे भूक से बिलक बिलक कर मेरे कदमों पर लोटते रहे मगर मैंने अपने माँ बाप से पहले उनको दूध पिलाना गवारा नही किया। यहाँ तक कि सुबह हो गई। तो या अल्लाह! अगर मैंने उस अमल को तेरी रज़ा के लिए किया हो तो हमारे लिए गार के मुँह को खोल दे कि हम लोग आसमान को देखने लगें। तो अल्लाह तआला ने उनके लिए गार के मुँह को इतना खोल दिया कि वह लोग आसमान को देखने लगे।' दूसरे आदमी ने यूँ दुआ माँगी कि या अल्लाह ! तुझको मालूम है कि मैं अपने चचा की लड़की से मुहब्बत करता था। ऐसी मुहब्बत जो मर्दो को औरतों से हुआ करती है। तो मैं उससे उसकी ज़ात का तलबगार हुआ उस पर उसने मुझ से एक सौ दीनार का मुतालबा किया। तो मैंने कोशिश करके एक सौ दीनार जमा किया। और उससे (तन्हाई में) मुलाकात की लेकिन जब मैं उसके दोनो पैरों के दरमियान बैठा (और बुराई का इरादा किया।) तो उसने कहा कि ऐ अल्लाह के बन्दे अल्लाह से डर और मेरी मुहर(बुकारत) को न तोड़। तो मै उठ कर खड़ा हो गया। ऐ अल्लाह अगर तेरे इल्म में मैंने यह तेरी रज़ा के लिए किया था तो इस गार को हमारे लिए खोल दे। तो कुछ और ज़्यादा खुल गया।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 52,53)*
*➡️जारी है*
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.*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣6️⃣*

*⚔️जन्नत तलवारों के साये में* 

📝हदीस :- हज़रत अबू मूसा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि यकीनन जन्नत के दरवाजे तलवारों के साये में हैं। यह सुनकर एक आदमी जो फ़रसूदा हाल था। खड़ा हो गया और कहा कि ऐ अबू मूसा ! क्या आपने खुद इस हदीस को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सुना है ? तो उन्होनें कहा कि हाँ तो उस *(फरसूदा हाल मुसलमान)* ने सलाम किया। फिर अपनी तलवार की नियाम को तोड़ कर फेंक दिया और तलवार लेकर दुश्मनों *(काफ़िरों)* पर हमला आवर हुआ। और लड़ता रहा यहाँ तक कि शहीद हो गया।

*📜तबसरा :-* इस हदीस से पता चला कि अगले मुसलमानों में किस कदर ईमानी जोशे,जिहाद और कितना जज़्बए शहादत, और किस दरजा जन्नत का शौक था। कि फ़रमाने रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सुनकर वह अमल के लिए बेताब हो गये। और शहादत के लिए इस तरह तैयार हो गये कि अपनी तलवार की नियाम को तोड़ कर फेंक दिया। कि मेरी तलवार को नियाम की ज़रुरत ही न रही। क्योंकि मुझे अब शहीद होकर जन्नत में ही पहुँच जाना है। सुब्हानल्लाह ! क्यों न हो कि उन्हीं ईमानो अमल के मुजस्समों और शम्ऐ रिसालत के परवानों की इन कुरबानियों और जाँ बाजियों ही का जलवा है कि आज तक इस्लाम का दरख्त फल फूल रहा है। मगर अफ़सोस आज कल के मुसलमानों में यह ईमानी जज़्बए फना, और जोशे जिहाद मादूम हो चुका है। यही वजह है कि अरबो अजम में हर जगह मुसलमानों के उरुज का परचम सरनिगों और उनके इकबाल का सूरज गिरहन की ज़द में है। अफ़सोस " फइलल्लाहिल मुशतका व इलैहित तवक्कुल।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 54,55)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣7️⃣*

*👑उम्मे सलीत को चादर क्यों मिली?*

💎हदीस :- हज़रते सालबा बिन अबी मालिक रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि एक मरतबा हज़रत अमीरुल मोमिनीन उमर फारुके आजम रदियल्लाहु तआला अन्हु अन्सार की औरतो में चादरें तकसीम कर रहे थें। तो एक चादर जो बहुत ही अच्छी और खूबसूरत थी बच रही। तो लोगों ने अर्ज किया कि ऐ अमीरुल मोमिनीन! यह चादर आप अपनी बीवी उम्मे कुलसूम बिन्ते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु को दे दीजिए। क्योंकि वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की साहिब ज़ादी *(नवासी)* हैं तो अमीरुल मोमिनीन ने फरमाया कि नहीं। इस कमली को पाने की हकदार उम्मे सलीत अन्सारिया है। उसने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बैअत भी की थी। और जंगे ओहद के दिन वह अपनी पीठ पर मश्क उठा उठा कर मुजाहिदीन को पानी पिला रही थीं।

*📝तशरीह :-* हज़रत उम्मे कुलसूम रदियल्लाहु तआला अन्हा हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु की साहिबजादी हैं। जो हज़रते फ़ातिमा रदियल्लाहु तआला अन्हा के बतने पाक से हैं। इस लिए हज़रत उम्मे कुलसूम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हकीकी नवासी है। अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु को बड़ी तमन्ना थी कि खानदाने अहले बैत से मेरी रिश्ता दारी हो जाए। तांकि दोनों जहान में मुझे शरफ़ हासिल हो जाए। चुनाँचे अपनी इस तमन्ना को आपने हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु के दरबार में पेश फ़रमाया। और हजरत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु ने इस दरख्वास्त को मन्जूर फरमाते हुए अपनी साहिब जादी हज़रत उम्मे कुलसूम रदियल्लाहु तआला अनहा का अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु से निकाह कर दिया। चुनाँचे हजरत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु के फ़रजन्द हज़रत जैद बिन उमर हज़रते उम्मे कुलसूम ही के श्किमे मुबारक से पैदा हुए थे।

*✨फ़वाइद व मसाइल :*
📑हदीस मजकूर से चन्द मसाइल मालूम हुए। हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु का ख़ानदाने नुबुव्वत से
रिश्ता करने के लिए ख्वाहिशमन्द ओर मुतामन्नी होना यह दलील है कि 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 55,56)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣8️⃣*

*💎उम्मे सलीत को चादर क्यों मिली:*

👑हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु की निगाह में ख़ानदाने अहले बैत की कितनी इज़्ज़त व अज़मत थी कि वह इस ख़ानदान से रिश्ता दारी के लिए अपने लिए दोनों जहान में बाइसे सरफराज़ी होने पर यकीन रखते थे मालूम हुआ कि हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु भी हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु से कितनी मुहब्बत व अकीदत रखते थे कि हज़रते उमर रदियल्लाहु की उम्र ज्यादा होने के बाद अपनी कमसिन साहिबजादी का उनके साथ निकाह कर दिया। यह तारीखे इस्लाम का अहम वाकिआ शियाओं के लिए ताज़ियानए इबरत है। जो हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु को गासिब व ज़ालिम बल्कि मुरतद व बे ईमान कह कर उन की तौहीन व इहानत से रु सियाह होते रहते हैं। कोई उन ज़ालिमों से पूछे कि तुम लोग अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु को क्या कहोगे ? जिन्होनें बकौल तुम्हारे एक मुरतद व बेईमान बूढ़े से अपनी कमसिन साहिबज़ादी का निकाह कर दिया। हज़रत अमीरुल मोमिनीन उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु के अदल व इन्साफ परवरी की तजल्ली भी इस हदीस से निहायत ताबानी के साथ जलवा रेज़ होती है। आप ने निहायत उम्दा व नफीस चादर अन्सार की एक गरीब औरत को उसकी दीनी ख़िदमात की बिना पर अता फरमाई और लोगों के इसरार के बावजूद आपने उम्मे कुलसूम को चादर नहीं दी। जो आपकी बीवी और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नवासी थीं। इससे साफ जाहिर है कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु के अदल के सामने कराबत और खानदान व नसब का कोई पास व लिहाज़ नही था। इसलिए आपका एक लकब अअदलुल असहाब *(सहाबा में सबसे बढ़कर आदिल)* भी है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 56,57)* 
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📑दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 2️⃣9️⃣*

*💎इस्लामी लश्कर का समुन्दरी जिहाद*

📝हदीस :- उम्मे हराम बिन्ते मुलहान रदियल्लाहु तआला अन्हा कहती है कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सो रहे थे। फिर मुस्कुराते हुए बेदार हुए तो मैंने अर्ज किया कि आप किस बात से हँसे ? तो आप ने फ़रमाया कि मेरी उम्मत के कुछ लोग मेरे सामने पेश किये गये कि वह इस सब्ज़ समुन्द्र में किश्तियों पर इस तरह बैठे हुए हैं जैसे बादशाह अपने तख्तों पर बैठा करते हैं। उम्मे हराम ने कहा कि आप दुआ फरमा दीजिए कि मुझ को अल्लाह तआला उन मुजाहिदीन में से बना दे। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दुआ फ़रमा दी। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सो गये और हँसते हुए जागे। और वही फ़रमाया जो पहले फरमाया था। तो उम्मे हराम ने कहा कि आप दुआ फरमा दीजिए कि मुझको उन मुजाहिदीन में से बना दे। तो आपने फरमाया कि तू इससे पहले वाले मुजाहिदीन के लश्कर में है। इसके बाद सबसे पहला जो मुसलमानों का लश्कर समुन्द्री जिहाद में रवाना हुआ तो उसमें उम्मे हराम अपने शौहर हज़रत उबादा बिन सामित के साथ गई। और उस जिहाद से वापस आकर मुजाहिदीन शाम में उतरे तो उम्मे हराम ऊँट से गिर कर वफात पा गई।

*💫फवाइद व मसाइल :-* सबसे पहला लश्कर जो समुन्द्री जिहाद में गया वह हजरत उस्मान गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु के दौरे खिलाफत में रवाना हुआ और उस जिहाद का सारा इन्तिज़ाम हजरत अमीरे मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फरमाया था। जब कि वह हज़रत उस्मान गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु की तरफ से शाम के गवर्नर थे। इस जिहाद मे उम्मे हराम रदियल्लाहु तआला अन्हा अपने शौहर हज़रत उबादा बिन सामित रदियल्लाहु तआला अन्हु के साथ गई। और ऊँट से गिर कर वफ़ात पा गई। फिर दूसरा समुन्द्री जिहाद 51 से 52 हिजरी में हज़रत अमीर मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु ने उस वक्त किया जब वह खुद ख़लीफ़ा बन चुके थे। यह मुजाहिदीन कुस्तुनतुनया पर हमला आवर हुए। और उस जिहाद में हज़रत अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु तआला अन्हु की वफ़ात इस शान से हुई कि आप बीमार थे तो आपने मुजाहिदीन से फरमाया कि
तुम लोग जब शहर का मुहासरा करो और मेरी वफात हो जाए तो मेरी लाश को उठाकर मुजाहिदीन की सफ में रखते चलो और आगे बढ़ते चलो। यहाँ तक कि मुझे मुजाहिदीन के क़दमों के नीचे दफ़न करना चुनाँचे कुस्तुनदुनिया की दीवार शहर के पास तक मुजाहिदीन उनकी लाश मुबारक को उठाकर बराबर आगे बढ़ते रहे और दीवारे शहर की जड़ में आपको दफन कर दिया। आज भी आपकी कब्रे मुबारक वहीं मौजूद है। और मरीजों को आपकी कब्र से शिफा मिलती है। इन दोनों समुन्द्री जिहादों के मुजाहिदीन के बारे में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मगफिरत और जन्नत की बशारत दी। मेरी उम्मत का पहला लश्कर जो समुन्द्री जिहाद करेगा। इसके लिए जन्नत वाजिब हो जाएगी। यानी पहला लश्कर जो कैसर के शहर पर जिहाद करेगा उसकी मगफिरत हो जायगी।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 57,58)* 
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣0️⃣*

*❣️दीन पर अमल हाथ में अँगारे लेने के बराबर;*

*📝हदीस :-* हजरत अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अनकरीब लोगों पर ऐसा ज़माना आ जायेगा कि उस ज़माने में दीन पर सब्र करने वाला हाथ में आग का अँगारा पकड़ने वाले के मिस्ल होगा।

*📑तबसरा :-*  मजकूरा बाला हदीस का मतलब यह है कि बे दीनी और बद दीनी का ऐसा दौर दौरा और दुश्मनाने दीन का ऐसा जबरदस्त तसल्लुत और गल्बा होगा कि दीन पर अमल करना उतना ही मुश्किल होगा जितना कि आग का अंगारा हाथ पर लेना मुश्किल होता है। इससे मालूम हुआ कि आज का वक्त अमल करने के लिए गनीमत है कि इस जमाने में दीन पर अमल करने में कोई मुश्किल नहीं है। लेकिन इस के बाद ऐसा ज़माना आने वाला है कि दीन पर अमल करना बेहद दुश्वार हो जायेगा खुदावन्द करीम उस वक्त के आने से पहले ही हम लोगों का ख़ातमा बिल खैर अता फरमाये आमीन।

💍इस हदीस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक गैब की ख़बर दी है कि जो ज़रुर होकर मुसलमान के लिए वाजिबुल ईमान और लाजिमुल अमल है कि इस ख़बर की रहे और उसके फितनों से खुदा की पनाह तलब करता रहे। ने गैब की ख़बर दी हैं वह सब आप के मोजिज़ात हैं। और यह दलील है कि खुदावन्द कुद्स ने हुजूर खातमुन्नबीयीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उलूमे गैबिया का खज़ाना अता फरमाया है। वल्लाहु तआला अअलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा 58,59)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣1️⃣*

*⛰️मिट्टी में मिल जाने वाली नाक*

*📑हदीस :-*  हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु नाकिल हैं उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल गई, उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल गई.उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल गई. तो किसी ने कहा वह कौन शख्स है ? या रसूलल्लाह तो आपने फरमाया कि वह शख्स जिसने अपने वालिदैन को बुढ़ापे की हालत में पाया ख्वाह एक को या दोनों को, फिर वह(वालिदैन की खिदमत करके) जन्नत में दाखिल नहीं हुआ।

*📝शरहे हदीस :-* अरबी के मुहावरे में " नाक मिट्टी में मिलने" का मतलब है " ज़लील व ख्वार होना और ना मुराद होना " हदीस् मजकूर का खुलासा मतलब यह है कि एक दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबा किराम के मजमअ में तीन मरतबा फ़रमाया कि उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल गई यानी वह शख़्स ज़लील व ख्वार हो गया यह सुनकर किसी सहाबी ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! वह कौन बदनसीब आदमी है जिसके बारे में तीन मरतबा आपने इरशाद फ़रमाया कि उसकी नाक मिट्टी में मिल गई? तो आपने फरमाया कि वह शख्स जिसने अपने माँ-बाप को या उन में से एक को बुढ़ापे की मन्जिल में पाया जबकि वह ख़िदमत और नेक सुलूक के लिए बहुत मोहताज थे उस शख्स पर लाज़िम था कि वह अपने वालिदैन की ज़्यादा से ज़्यादा खिदमत और उसके साथ अच्छा बरताव करके जन्नती बन जाता। मगर उस शख्स ने इस सुनहरे मौका को ज़ाए कर दिया और माँ बाप के साथ अच्छा सुलूक नही किया तो वह शख़्स यकीनन खाएब व खासिर और ना मुराद हो गया। और दुनिया व आखिरत में अपने माथे पर कलंक का टीका लगवा कर दोनों जहान में ज़लील व ख्वार हो गया। शारेहीने हदीस ने फ़रमाया कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जुमला " रगिम अन्फहू" जुमला खबरिया भी हो सकता है और जुमला दुआइया भी। पहली सूरत में इसका तर्जुमा यह होगा कि " उस शख़्स की नाक मिट्टी में मिल गई। और दूसरी सूरत में इस का तर्जुमा यह होगा कि " उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल जाए" |
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 60,61)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣2️⃣*

*👑मिट्टी में मिल जानें वाली नाक*

*❣️फवाइद व मसाइल :-* माँ-बाप के साथ हर मामले में भलाई और उनके साथ अच्छा सुलूक करना हर मुसलमान मर्द औरत पर लाज़िम है। और माँ-बाप की नाफरमानी और उनकी ईज़ा रसानी गुनाहे कबीरा है चुनाँचे कुरआने मजीद में खुदावन्द कुद्दूस जल्ला जलालुहू का फरमान है।और मां-बाप के साथ अच्छा सुलूक करो। अगर तेरे सामने उनमें से एक या दोनों बुढ़ापे को पहुँच जायें तो उन से "उफ" न कहना। और न उन्हें झिड़कना, और उनसे ताजीम की बात करना, और उन दोनों के लिए आजिज़ी का बाजू नरम दिली के साथ बिछाये रखना। और उन दोनों के।लिए यूँ दुआ करना कि ऐ मेरे रब! तू इन दोनों पर रहम फ़रमा जैसा कि इन दोनों ने मुझे बचपन में पाला था" *(कुरआन)*

💍हदीस मजकूर और आयते करीमा के हर हर लफ्ज़ से वालिदैन की इज्जत व अज़मत और उनके एजाज व इकराम का डंका बज रहा है। और बच्चों के ऊपर माँ बाप का कितना बड़ा हक है इस हदीस और आयते करीमा ने इसका ऐसा नक्शा खींचा है कि जिस के तसव्वुर मर्द व औरत के दिल व दिमाग में माँ-बाप की ताज़ीम और इन दोनों के साथ हुस्ने सुलूक और अच्छे बरताव का आफ़ताब तुलू हो जाता है। माँ-बाप को मारना, धक्के देना या कोई ईज़ा पहुँचाना यह तो बड़ी बात है। हद हो गई कि माँ बाप की कोई बात सुनकर अगर कोई सिर्फ "उफ' या "हूँ" या " हश" कह दे। तो वह भी गुनाहे कबीरा के ऐसे गन्दे और घिनौने कीचड़ में गिर पड़ा कि बिगैर तौबा किये और बिगैर माँ बाप से माफ कराये। वह उस गुनाह की निजासत से हरगिज़ हरगिज़ पाक नहीं हो सकता। तौबा नऊजुबिल्लाह ! आजकल औलाद अपने माँ-बाप के साथ जो बद सुलूकियाँ और ईज़ा रसानियाँ कर रही हैं। उन्हें सोचना चाहिये कि वह  कुरआन व हदीस के उन मुकद्दस फरमानों के ख़िलाफ़ कितना अज़ीम अलमे बगावत बुलन्द किये हुए हैं और मुस्लिम मुआशरे के हरे भरे फले फूल खूबसूरत और खुशनुमा दरख्त पर किस जाहिलाना और जालिमाना तौर पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं और अपनी दुनिया आखिरत को तबाह व गारत करके दोनों जहान में कहर कहहार और गज़बे जब्बार के सज़ावार बने हुए हैं।

💎लिल्लाह ! आप अपने वालिदैन खुसूसन बूढ़े माँ बाप की ज़्यादा से ज्यादा और अच्छी से अच्छी तरह खिदमत करके अपने जन्नती बनने का सामान कीजिए। और खुदा नख्वास्ता अगर अब तक आप से माँ बाप की खिदमत में कोताही होती रही है तो फौरन उस गुनाहे कबीरा से सच्ची तौबा. करके ओर अपने वालिदैन से माफी तलब करके इस गुनाहे कबीरा की गन्दगी से पाक व साफ बन जाईये। ताकि आप खुदावन्द जुल जलाल के गज़ब से निजात पाकर उसकी रज़ा और खुशनूदी की दौलत ला जवाल से माला माल हो जाएं। तिरमिजी शरीफ की हदीस है कि हुजूर सल्लल्लाहु .तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ;"बाप की खुशनूदी में खुदा की रज़ा है और बाप की नाराज़गी में खुदा.का गज़ब है। मौला तआला हर मुसलमान को अपने वालिदैन की रजा जोई और खुशनूदी की तौफीक अता फरमाये। आमीन ।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 61,62)*
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*💎दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣3️⃣*

*🕋दिन भर में एक सौ हज का सवाब*

💎हजरत इब्ने अब्बास रदियल्लाहु तआला अन्हुमा कहते हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो नेकू कार लड़का अपने वालिदैन को शफकत की नजर से देखेगा तो अल्लाह तआला उसको हर नजर के बदले में उसके लिए एक हज मकबूल *(का सवाब)* लिखेगा।तो लोगों ने कहा कि अगरचे वह एक दिन में एक सौ मर्तबा देखे! तो फरमाया. कि हाँ अल्लाह बहुत बड़ा है। अल्लाह बहुत पाक है।

📜इस हदीस को इमाम बयहकी ने शोअबुल ईमान में नकल फरमाया है इस हदीस का हासिले मतलब यह है कि जो मुसलमान ख्वाह लड़का हो या लड़की छोटा हो या बड़ा। अगर अपने वालिदैन का फरमाँ बरदार और खिदमत गुजार हो तो वह जब भी और जहाँ भी और जिस ववक़्त भी अपने माँ बाप को शफकत की नज़र से देखेगा! तो अल्लाह तआला उसकी हर नज़र के बदले में उसको एक हज मकबूल का सवाब अता फरमायेगा! यह इरशादे नबवी सुनकर सहाबा किराम को इस सवाब की कसरत पर तअज्जुब हुआ! और उन्होंने दरयाफ्त किया कि या रसूलल्लाह! जब हर नज़र के बदले में उसको एक हजे मकबूल का सवाब मिलेगा तो अगर कोई शख्स अपने वालिदैन को दिन भर में एक सौ मरतबा रहमत की नजर से देखे तो क्या इस हिसाब से उसको एक सौ हज मकबूल का सवाब मिलेगा? तो फरमाया कि हाँ। उसको एक सौ हजे मकबूल का सवाब मिलेगा। और तुम लोग तअज्जुब क्यों करते हो ? अल्लाह. तआला बहुत बड़ा है उसके ख़ज़ानों में कोई कमी नहीं है वह कितना ही ज़्यादा से ज्यादा और बड़े से बड़ा सवाब अता फरमाये उसके लिए कुछ दुश्वार नहीं है। क्योंकि वह बहुत बड़ा है। और कितना ही ज्यादा से ज्यादा और बड़े से बड़ा सवाब हो अल्लाह तआला उसको देने से आजिज नहीं हैं। क्योंकि वह आजिज़ व कासिर होने से पाक है। लिहाजा वह छोटे से छोटे अमल पर भी बड़े से बड़ा सवाब अता. फ़रमा सकता है। इस लिए दिन भर में एक सौ मरतबा देखने पर एक सौ हज मकबूल का सवाब अता फरमाये तो यह उसके लिए न दुश्वार है न काबिले तअज्जुब । क्योंकि वह अकबर यानी सब से बड़ा और अतयब है यानी हर किस्म की आजिज़ी और कोताही से पाक है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 62,63)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣4️⃣*

*🌥️दिन भर में एक सौ हज का सबाब*

📜हदीसों में इस किस्म के छोटे छोटे दूसरे आमाल का भी ज़िक्र है जिस पर अल्लाह अज्जवजल के महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज का सवाब मिलने की बशारत दी है। चुनाँचे एक हदीस में है कि जो शख्स फजर की नमाज़ जमाअत से पढ़कर अपने मुसल्ला पर बैठा रहे और जिक्रे इलाही में मश्गूल रहे। यहाँ तक कि जब आफ़ताब बुलन्द हो जाए तो वह नमाजे इश्राक पढ़कर मस्जिद से निकले। तो अल्लाह तआला उसको एक हज और एक उमरा का मुकम्मल सवाब अता फरमायेगा इस हदीस पर बज़ाहिर एक मोतअज्जिबाना सवाल पैदा होता है कि जब माँ बाप को शफकत की नज़र से देख लेने पर एक मकबूल हज का सवाब मिल जाता है तो इस ऐतिबार से वालिदैन को नज़रे रहमत से देख लेना और बैतुल्लाह शरीफ़ जाकर हज करना यह दोनों अमल बराबर हो गये तो फिर बैतुल्लाह के तवील सफर और वहाँ जाकर तवाफे काबा और सफा मरवा की सई अराफात में दिन भर ठहरने मशक्कत उठाने दौलत खर्च करने की ज़रुरत ही क्या है?

📿बस वालिदैन को नज़रे रहमत से देख लिया। और हज का सवाब मिल जाएगा। तो इस सवाल का जवाब यह है कि एक है अमल और एक है अमल का सवाब अगर किसी छोटे अमल पर खुदावन्द तआला किसी बड़े अमल का सवाब अता फरमाये तो इससे यह लाज़िम नहीं आता कि यह दोनों अमल दर्जे में बराबर हो गये। यह तो खुदावन्द करीम का फज़लो करम कहलायेगा कि उसने अपनी नवाज़िश से छोटे अमल पर बड़े अमल का सवाब अता फरमा दिया। वरना कहाँ बड़े अमल की फजीलत और कहाँ छोटे अमल का दर्जा? मिसाल के तौर पर यूँ समझिये कि अगर किसी बादशाह ने अपने वफादार और जाँ निसार जनरल को जिसने अपनी जान को हथेली पर रखकर जंग की और फतह हासिल की, बतौर इनाम के एक गाँव की जागीर अता कर दी। और थोड़ी ही देर बाद बादशाह ने एक शायर को कोई अच्छा शेर सुनकर उसको भी एक गाँव की जागीर दे दी। तो हालाँकि बादशाह ने दोनो को बराबर ही इन्आम दिया। लेकिन कौन कह सकता है कि जनरलं का कारनामा और शायर का कारनामा दोनों बराबर हो गये। हर शख्स जानता है कि जनरल का मरतबा दरबारे शाही में जितना बुलन्द व बाला है शायर का मरतबा उसके हजारवी हिस्सा के बराबर भी नहीं। कहाँ एक जनरल ? और कहाँ एक शायर?

✨इसी तरह समझ लीजिए कि अगरचे हजे बैतुल्लाह करने वाले और वालिदैन को शफकत की नज़र से देखने वाले दोनों को अल्लाह तआला बराबर ही सवाब अता फरमाता है मगर हज बैतुल्लाह करने वाले का जो अज़ीम मरतबा खुदावन्द कुद्दूस के दरबार में है उसका हज़ारवें हिस्से के बराबर भी वालिदैन को नज़रे रहमत से देखने वाले का नहीं। बहर हाल खुलासा यह है कि सवाब के बराबर होने से अमल का बराबर हो जाना कोई ज़रुरी नहीं है। अमल और चीज़ है और सवाब एक दूसरी चीज़ है। इसके अलावा यह बात भी मलहूजे ख़ातिर रहे कि दो चीज़ो में बराबरी दो हैसियतों से हुआ करती हैं। कभी कम्मियत *(नाप तौल)* में बराबरी हुआ करती है और कभी कैफियत *(रुतबा व कीमत)* में बराबरी हुआ करती है। दो चीज़े अगर नाप तौल में बराबर हों। तो उससे यह लाज़िम नहीं आता कि वह दोनों चीज़े कैफियत यानी रुतबे और कीमत में भी बराबर हो जाएं। 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 63,64)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर::3️⃣ 5️⃣*

*🌥️दिन भर में एक सौ हज का सबाब* 

⚜️मसलन एक सेर सत्तू ओर एक सेर हलवा कम्मियत यानी वज़न और मिकदार में तो दोनो बराबर हैं मगर कैफियत यानी लज्जत और कीमत में बराबर नहीं। इसी तरह एक सेर लोहा और एक सेर सोना कम्मियत यानी वज़न और मिकदार में तो दोनों बराबर हैं मगर कैफियत यानी चमक दमक और रुतबा में हरगिज़ हरगिज़ दोनों बराबर नहीं हो सकते। कहाँ लोहा और कहाँ सोना? इसी तरह बैतुल्लाह शरीफ़ के हज का सवाब वालिदैन को नज़रे रहमत से देखने का सवाब अगरचे कम्मियत ओर मिकदार के लिहाज़ से तो बराबर है। लेकिन कैफियत यानी दरजा व फज़ीलत, के लिहाज़ यकीनन दोनों में बड़ा फर्के अज़ीम है। लिहाज़ा इन दोनों का सवाब एक हैसियत से बराबर है और  एक हैसियत से बराबर नहीं इस लिए यह दोनों अमल कभी हरगिज़ हरगिज़।हैसियत से बराबर नहीं हो सकते।

📝बहर हाल वालिदैन को मुहब्बत व शफकत की नज़र से देखना अगरचे हर हैसियत से हजे काबा के बराबर नहीं मगर यही क्या कम है कि खुदावन्द करीम इस मामूली से अमल से खुश होकर अपने फ़ल व करम से हज का सवाब अता फरमाता है। लिहाज़ा हर मुसलमान पर लाज़िम है कि वह अपने वालिदैन को कभी और किसी वक्त भी हरगिज़ हरगिज़ नफरत व हिकारत की नज़रों से न देखे। बल्कि हमेशा उनको मुहब्बत व अकीदत और रहमत।व शफ़क़त की निगाहों से देखा करे। और हर नज़रे रहमत पर एक हज का सवाब हासिल करता रहे। और फलाहे दारैन की।सआदतों से बहरामन्द व।सरफ़राज़ होता रहे। वल्लाहु तआला अअलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 64,65)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣6️⃣*

*🌏दुनिया ही में गुनाह का   अज़ाब* 

🔥हज़रत अबू बक्र रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि तमाम गुनाहों में से जिसको अल्लाह तआला चाहता है बख्श देता है बजुज वालिदैन की ईज़ा रसानी के क्योंकि इस गुनाह करने वाले को अल्लाह तआला उसकी मौत से पहले उसकी ज़िन्दगी में ही अज़ाब दे दिया करता है। 

🌟दुनिया दारुल अमल यानी अमल का घर है और अख़िरत दारुल जज़ा यानी बदले का घर है। अल्लाह तआला का वादा है कि वह हर नेकी का सवाब और गुनाह का अज़ाब आखिरत में देगा। मगर वह बड़ा गफूरुर रहीम है। वह बन्दों के गुनाहों में जिस गुनाह को बख़ाना चाहता है बख़्श देता है। और आख़िरत में उस गुनाह पर बन्दों को कोई अज़ाब नहीं देगा मगर माँ बाप की नाफरमानी और उनकी ईजा रसानी वह ख़तरनाक गुनाहे कबीरा है कि अल्लाह तआला उसको माफ नहीं फरमाता बल्कि उस पर इस कदर गज़ब व जलाल का इजहार फरमाता है कि सिर्फ आख़िरत ही में नहीं बल्कि इस गुनाहगार को उसकी मौत से पहले दुनयवी जिन्दगी में ही अज़ाब के अन्दर गिरफ्तार फरमा देता है।

❣️चुनाँचे बारहा का तुर्जबा है कि वालिदैन के सताने वालों का बहुत बुरा अन्जाम होता है। और यह लोग अपनी दुनययी ज़िन्दगी ही में तरह तरह की इबरतनाक अज़ाबों में गिरफ्तार हो गये है। बल्कि ऐसा भी देखने में आया हे कि वालिदैन के सताने वालों को खुद उन की औलाद ने ठीक उसी तरह सताया जिस जिस तरह उन लोगों ने अपने माँ बाप को दुख दिया था। बहरहाल वालिदैन की ईज़ा रसानी और ना फरमानी इस लिहाज़ से दूसरे कबीरा गुनाहों से ज़्यादा हौलनाक और बड़ा गुनाह है कि दूसरे कबीरा गुनाहों को तो खुदावन्द करीम मुआफ भी फरमा देता है और बाज़ गुनाहों पर सिर्फ आख़िरत में अज़ाब देता है मगर वालिदैन की ईज़ा रसानी पर तो दुनिया ही में अज़ाबे खुदावन्दी की मार पड़ती है। और अख़िरत का अज़ाब बहर हाल उस गुनाहगार को मिलने वाला ही है। क्योंकि आखिरत दारुल जजा यानी बदले का घर है। इस लिए माँ बाप को सताने वाला दुनियां व आखिरत दोनों घरों में अज़ाब का हकदार है। नऊजु बिल्लाह मिन्हु। यल्लाहु तआला अअलम। 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 65,66)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣7️⃣*

*🔥दोज़ख़ से बचाने वाला पर्दा*

*हदीस :-* हज़रत बीबी आयशा रदियल्लाहु तआला अन्हा का बयान है कि मेरे पास एक औरत अपनी दो बेटियों के साथ आयी और भीक माँगने लगी तो उसने मेरे पास एक खजूर के सिवा कुछ नहीं पाया तो मैंने वही एक खजूर उसको दे दी। तो  उसने उस खजूर को अपनी दोनों बेटियों के दरमियान तकसीम कर दिया और खुद नहीं खाया। फिर वह खड़ी हुई और घर से बाहर चली गयी। उसके बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मकान में दाखिल हुए तो मैंने यह माजरा आप से बयान किया तो आपने फरमाया कि जो शख्स इन बेटियों के साथ आजमाइश में डाला गया और उसने अपनी बेटियों के साथ बेहतरीन सुलूक किया तो यह बेटियाँ उसके लिए जहन्नम से परदा बन जायेंगी। 

*📝तशरीह हदीस :-* इस हदीस की बाज़ रिवायात में यूँ भी वारिद हुआ है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने उस औरत के लिए जन्नत वाजिब फरमादी, या हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि उस औरत को अल्लाह तआला ने जहन्नम से आज़ाद फरमा दिया 
*(📗मुस्लिम, जिल्द, 2 सफा 330)*

📿और हजरत अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु की रिवायत में यूँ भी आया है कि:" जो मुसलमान दोबेटियों को उनके बालिग होने तक परवरिश करेगा तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी दो उँगलियों को मिलाकर फरमाया कि मैं और वह कयामत के दिन इस तरह साथ रहेंगे" खुलासए कलाम यह है कि इन हदीसों में उन वालिदैन के लिए बशारते उज्मा और खुशखबरी है जो चन्द बेटियों के माँ बाप हैं। और मुहब्बत व शफकत के साथ खुदा की नेअमत समझ कर परवरिश करते हैं। क्योंकि फरमाने रसूल के मोजिब यह बेटियाँ माँ बाप के लिए आतिशे जहन्नम से बचाने वाला परदा बनेंगी। और जन्नत में दाखिल होने का ज़रिआ बन जायेंगी। जो लोग अपनी जहालत से बेटियों को हकीर समझ कर उनसे नफरत करते हैं वह इन हदीसों से सबक हासिल करें। और अपने गुनाहों से तौबा करें। और बेटों की तरह बेटियों को भी खुदा की नेअमत समझ कर उनकी परवरिश करते रहें। और खुदावन्द कुद्दूस से उसके अजरो सवाब की उम्मीद रखें। वल्लाहु तआला अअलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 66,67)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣8️⃣*

*💎मरातिब और दरजात का लिहाज़*

*📝हदीस :-* हज़रत मैमून बिन शबीब कहते हैं कि हज़रत बीबी आयशा रदियल्लाहु तआला अन्हा के पास एक साइल का गुज़र हुआ तो आपने उसको रोटी का एक टुकड़ा दे दिया। फिर उनके पास एक खुश पोशाक और अच्छी हैयत वाला आदमी गुज़रा। तो आपने उसको बिठाया और खाना खिलाया। तो किसी ने इसके बारे में आप से कहा *( क्यों एक शख्स को रोटी का टुकड़ा देकर रुख़सत कर दिया और एक को बिठाकर खाना खिलाया)* तो आपने जवाब दिया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का फरमान है कि लोगों को उनके मरातिब व दरजात की मन्जिलों में उतारा करो। 

*📑शरहे हदीस :-* उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हुमा इल्मो फज्ल, जोह्दो इबादत, मेहमान नवाज़ी और सखावत के ऐतिबार से तमाम अज़वाजे मुताहरात में बहुत मुमताज़ थीं। आपकी सखावत का तो यह हाल था कि एक मरतबा कहीं से एक लाख दिरहम का नज़राना उनकी ख़िदमत में आया तो आपने फौरन ही उसी वक्त उन सब दिरहमों को खैरात कर दिया। आपकी ख़ादिमा उम्मे दरा का बयान है कि हज़रत आयशा रदियल्लाहु तआला अन्हा उस रोज़ रोज़ा दार थीं। तो मैंने अर्ज़ किया कि आपने उन सब दिरहमों को खैरात कर दिया और एक दिरहम भी आपने बाकी नही रखा कि उससे आप गोश्त खरीद कर रोज़ा अफ़तार करतीं। तो आप ने फ़रमाया कि अगर पहले तुम ने कह दिया होता तो मैं एक दिरहम का गोश्त मँगा लेती। यही वजह है कि 
हर किस्म के लोग आपकी जियारत के लिए दरे दौलत पर हाज़िरी दिया करते थे। अगर एक तरफ फुकहा व मुहददिसीन का इजतिमा रहता था तो दूसरी तरफ़ फुकरा व मसाकीन का भी मजमा लगा रहता था
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 67,68)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*⚜️दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 3️⃣9️⃣*

*📑मरातिब और दरजात का लिहाज* 

📝और आपके दरवाजे से कोई महरुम व ना मुराद होकर वापस नहीं जाता था। चुनाँचे मैमून बिन शबीब ताबेई का बयान है कि हज़रत आयशा रदियल्लाहु तआला अन्हा के दरवाजे पर एक भीक माँगने वाले साइल का गुज़र हुआ तो आपने रोटी का एक टुकड़ा देकर रुखसत कर दिया। मगर उसके बाद एक खुश लिबास और अच्छी सज धज का आदमी हाज़िर हुआ तो आपने उसको रोटी देकर रुखसत नहीं किया बल्कि उसको मेहमान बनाकर बिठाया और उसको खाना खिलाया। उम्मुल मोमिनीन के इस तरज़े अमल से हैरान होकर एक शख्स ने सवाल किया कि ऐ उम्मुल मोमिनीन! आप ने ऐसा क्यों किया? कि एक शख्स को आपने रोटी का एक टुकड़ा देकर रुखसत कर दिया और दूसरे की इतनी आवभगत की कि उसको मेहमान की तरह पूरे ऐजाज़ के साथ बिठा कर खाना खिलाया। आपने हर आने वाले के साथ यकसाँ सुलूक क्यों नहीं किया? तो आपने फरमाया कि मैनें फ़माने रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर अमल करते हुए ऐसा बरताव किया है क्योंकि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह फरमाया है कि " अन्ज़िलुन्नासा मनाज़िलाहुम" यानी पास मरातिब का ख्याल और लोगों के दरजात का लिहाज रखो। ओर जो जिस मरतबा और जिस पोजीशन का आदमी हो उसके दरजात व मरातिब के लिहाज़ से उसके साथ सुलूक और बरताव करो। पहला शख़्स चूंकि एक गदागर था। दर बदर भीक माँगना उसका काम धंधा था इसलिए मैंने उसको रोटी का एक टुकड़ा देकर चलता कर दिया। लेकिन दूसरा शख्स अपने लिबास व पोशाक और सज धज के ऐतिबार से एक बा वकार आदमी था। इस लिए मैंने गदागरों की तरह उसको कुछ देकर रुख़सत करना मुनासिब नहीं समझा। बल्कि उसको एक मुअज्जिज़ आदमी की तरह मैंने ऐजाज व इकराम के साथ खाना खिलाकर रुखसत कर दिया।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 68,69)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣0️⃣*

*❣️मरातिब और दरजात का लिहाज*

*💎फवाइद व मसाइल :-* हदीस मजकूरा बाला से चन्द मसाइल व फवाइद मालूम हुए जो हस्बे जैल हैं। हर आने वाले मेहमान के साथ यकसाँ और बराबर दरजे का सुलूक करना ज़रुरी नहीं है। बल्कि मसनून तरीका यही है कि आने वाले मेहमानों और मुलाक़ातियों मे जो जिस दरजे का आदमी है। उसके दरजात व मरातिब के लिहाज से उसकी मेहमान नवाज़ी और खातिर व मदारत करनी चाहिये। चुनाचे हदीसों से साबित है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाहै अकदस में यूँ तो रोज़ाना ओर हर वक्त ही हाज़िरी देने वालों का हुजूम रहता था। और आप हर शख्स के लिए अपने हुस्ने अखलाक का मुज़ाहिरा फरमाते हुए उसपर नवाज़िश फरमाते थे। लेकिन जब कबाइल के मोअज्जिज सरदारों की मेहमान नवाज़ी, उनके क़याम व तआम के इन्तिजाम और उनसे मुलाकात के लिए तैयारी में खुसूसी एहतिमाम फरमाते थे। खुद उम्दा और नफीस लिबास ज़ेब तन फ़रमा कर उन सरदारों को बारगाहे आली में बारयाब फरमाते और उन लोगों को हदाया व तहाइफ अता फरमा कर पूरे ऐजाज़ के साथ रुखसत फरमाते थे। यहाँ तक कि बहुत से सरदाराने कबाइल व अख़लाके नबविया के करीमाना सुलूक से मुतअस्सिर होकर वे इख्तियार आगोशे इस्लाम में आ जाते थे। और बहुतं से कबाइल के शोअरा आपकी मदह में कसाइद पढ़ने लगते थे। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अख़लाके करीमाना और आपकी शानदार मेहमान नवाज़ियों का दूर दूर तक चर्चा करते फिरते थे।

📿हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का खुद भी यही दस्तूरे अमल था। और अपने असहाब को भी इसी का हुक्म देते थे। और फरमाते थे कि “इज़ा अताकुम करीमुन कौमन फअकरेमूहो" यानी जब किसी काम का कोई शरीफ व मोअज्ज़िज़ शख्स तुम्हारे पास आये तो तुम उसका ऐजाज़ व इकराम करो और उसके दरजात व मरातिब के लिहाज़ से उसके शायाने शायान उसकी खातिर दारी का इन्तिज़ाम करो। अगर किसी के घर चन्द किस्म के मेहमान आयें कुछ अवाम और कुछ खवास तो वह शख्स अगर खवास के लिए पलंग और अच्छे बिस्तरों का इन्तिज़ाम करे और अवाम को ज़मीन पर बिछौना बिछा कर सुलाए। इसी तरह ख़वास के लिए दूसरे किस्म का ख़ास खाना तैयार कराये। और अवाम के लिए आम खाने का इन्तिज़ाम करे तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि उसने " अन्जेलुन नासा मनाजेलुहुम' के फरमान पर अमल किया कि हर शख्स कि लिए उसके मरातिब व दरजात के ऐतिबार से अलग अलग इन्तिज़ाम करो। वल्लाहु तआला अलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 69,70)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣1️⃣*

*👥तीन काबिले एहतिराम हस्तियाँ*

📿हदीस :- हजरत अबू मूसा रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि *( यह तीन चीजें भी)* अल्लाह अज्जा वजल की ताज़ीम में से हैं।
(1) बूढे मुसलमान का एहतिराम करना। (2) उस हाफिजे कुरआन का एहतिराम करना, जो कुरआन में हद से बढ़ने वाला और दूरी बरतने वाला न हो। (3)आदिल बादशाह का एहतिराम करना।

*📝शरहे हदीस :-*  हदीसे मजकूरा का खुलासा व मतलब यह है कि जिस ने इन तीन शख्सो का ऐजाज़ व इकराम किया. दर हकीकत उसने अल्लाह तआला की ताज़ीम की। याद रखो कि किसी की ताज़ीम की दो- सूरते हैं। एक तो यह कि उसकी ज़ात की ताजीम की जाए। दूसरे यह कि जिन जिन चीज़ो को उसकी जात से तअल्लुक हो उनकी ताज़ीम की जाए। तो बूढे मुसलमान और हाफिजे कुरआन और बादशाहे आदिल का ऐज़ाज़ व इकराम चूँकि इसी हैसियत से किया जाएगा कि यह तीनों अहकामे खुदावन्दी की पैरवी करके खुदावन्द तआला के मुकर्रब बन्दे हो गये हैं। और उन लोगों को खुदा के कुर्बे ख़ास से निस्बत हासिल हो गई है। इसी लिए इस हैसियत से इन लोगों की ताज़ीम दर हकीकत खुदा ही की ताज़ीम है। जाहिर है कि जिस मुसलमान ने इस्लाम पर अमल करते करते अपने बालों को सफेद कर डाला और बूढ़ा हो गया। वह ब निस्बत उन मुसलमानों के जिन को थोड़े ही दिनों इस्लाम पर अमल करना नसीब हुआ। यकीनन एक खास किस्म की फजीलत का हामिल है।

🔰 इसी तरह वह मुसलमान जिसने मेहनते शाक्का उठाकर कुरआन मजीद को हिफ़्ज़ कर लिया और कुरआन का अमीन बन कर कुरआन में किसी किस्म की तहरीफ़ और उसके मआनी व मतालिब में कोई तबदीली या कमी बेशी नहीं की। और हमेशा कुरआन को पढ़ता और उसके अहकाम पर अमल करता रहा। और कभी कुरआन से ऐराज़ व रु गरदानी नहीं की। वह बिला शुबा दूसरे लोगो से बहुत ज्यादा लायके एहतिराम और एक बहुत बड़ी ख़ास फजीलत का जामे है। यूँ ही एक खुद मुख्तार बादशाह जिसको यह पावर हासिल थी कि वह इन्साफ़ या जुल्म जो चाहता अपनी सल्तनत में कर सकता था। लेकिन उसने अपनी खुदमुख्तारी को फरमाने रब्बानी पर कुरबान करते हुए हमेशा अदल ही किया। और जुल्म से बचता रहा। वह बिलयक़ीन एक बहुत बड़ी फजीलत के शरफ़ से सर फ़ाज़ है। लिहाज़ा यह तीनों अशख़ास बिला शक व शुबा ताजीम व इकराम व ऐजाज़ व एहतिराम के काबिल हैं इसलिए जो इन तीनों की ताज़ीम करेगा, खुदावन्द कुद्दूस, उसको ऐसा ही और इतना ही अजरो व सवाब अता फरमायेगा जितना कि अपनी जात पाक की ताज़ीम करने वालों को अजरो सवाब अता फरमाता है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 70,71)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣2️⃣*

*👤तीन क़ाबिले एहतिराम हस्तियाँ*

*💎फवाइद व मसाइल :-* इस हदीस से मुन्दरजा जैल मसाइल का सुबूत मिलता है 

*(1)* ❣️बूढ़ा मुसलमान, हाफिजे कुरआन, और आदिल बादशाह यह तीनों लायके ताज़ीम और काबिले एहतिराम हैं। और हर मुसलमान पर हक़ है कि इन तीनों का ऐजाज़ व इकराम करे। अगर कोई इन तीनों की तौहीन करे तो वह हककुल्लाह व हक्कुल अब्द में गिरफतार और अज़ाबे जहन्नम का सजावार है।

*(2)* अगर कोई बूढ़ा मुसलमान न हो तो वह लायके ताजीम नहीं। क्योंकि " जिश् शैबतिल मुस्लिम" के अल्फाज़ हदीस में “ मुस्लिम" की कैद लगी हुई है। यानी बूढ़ा होने के साथ साथ अहकामे इस्लाम का पाबन्द भी हो तो वह काबिले एहतिराम है।

*(3)* इसी तरह वह हाफिज़े कुरआन जो कुरआन मजीद की तिलावत नहीं करता। या कुरआन की आयतों में अल्लम गल्लम पढ़ कर अल्फाज़े कुरआन में तहरीफ व तबदीली करता हो वह भी काबिले ताज़ीम नहीं। क्योंकि हदीस में " गैरल गाली फ़ीहे वलल जाफ़ी अन्हु" की कैद लगी हुई है। यानी वही हाफ़िज़े कुरआन लायके एहतिराम है जो इन दोनों जुर्मो से बरी और पाक हो।

*(4)* इसी तरह ज़ालिम बादशाह अगरचे कितना ही बड़ा बादशाह क्यों न हो हरगिज काबिले इज़्ज़त व एहतिराम नहीं। क्योंकि हदीस में बादशाहे आदिल को काबिले इज़्ज़त व एहतिराम बताया गया है। मालूम हुआ कि ज़ालिम बादशाह ताज़ीम का अहल नहीं।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 71,72)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣3️⃣*

*🔰तीन क़ाबिले एहतिराम हस्तियाँ*

💎(5)इन तीनो शख्सों की ताज़ीम को अल्लाह तआला ने अपनी ताज़ीम करार दिया है। क्योंकि इन तीनों को खुदा का कुर्ब हासिल है। तो फिर जाहिर है कि महबूबाने बारगाहे इलाही यानी. उल्मा व सुल्हा और औलियाए किराम व शोहदाए इज़ाम की ताज़ीम व इकराम व अज़मत का क्या  हाल होगा? और फिर हुजूर सय्येदुल अम्बिया सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताज़ीम व तकरीम की जलालते शान का क्या कहना ? जिन को बारगाहे खुदावन्दी में कुर्बे ख़ास की वह अज़मत मिली है जिसकी बुजुर्गी और बढ़ाई का कोई तसव्वुर भी नहीं कर सकता। इस लिए साबित हो गया कि हुजूर सय्येदुल अम्बिया सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम अम्बिया अलैहिमुस्सलाम और तमाम उल्मा व सालेहीन और औलियाऐ कामेलीन की ताज़ीम दर हकीकत खुदा वन्द करीम की ही ताजीम है। और जो शख़्स इन मुकर्रबाने बारगाहे इलाही की ताज़ीम करेगा अल्लाह तआला उसको वही अजरो सवाब अता फरमायेगा जो अपनी ज़ात की ताजीम करने वालों को इनायत फरमाता है और उसका लाज़िमी नतीजा यह है कि जो बदबख्त इन महबूबाने इलाही की ताज़ीम से इन्कार कराता है वह दर हकीकत रब्बुल इज़्ज़त जल्ला जलालुहू की ताज़ीम से इन्कार करता है। और उसको मरदूद जहन्नमी के सिवा और क्या कहा जा सकता हैं।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 72,73)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣4️⃣*

*👥बेहतरीन साथी और बेहतरीन पड़ोसी*

🔮हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है उन्होने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तमाम साथियों में सब से बेहतरीन साथी अल्लाह तआला के नज़दीक वह शख्स है जो अपने साथियों के हक में सब साथियों से ज़्यादा अच्छा हो और तमाम पड़ोसियों में सब से बेहतरीन पड़ोसी वह शख्स है जो अपने पड़ोसियो से ज़्यादा अच्छा हो। 

📜इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी व इमाम दारमी ने अपनी अपनी किताबों में तहरीर फ़रमाया है। इस हदीस का खुलासा यह है कि इस दुनिया में तकरीबन हर शख़्स के कुछ साथी और कुछ पड़ोसी जरुर होते हैं। और यह भी यकीनी बात है कि हर साथी और हर पड़ोसी बराबर दरजे के नहीं हुआ करते। बल्कि कुछ साथी अच्छे भी हुआ करते हैं और कुछ बुरे भी। इसी तरह कुछ पड़ोसी अच्छे भी होते हैं और कुछ बुरे भी। लेकिन सवाल यह है कि अल्लाह तआला के नज़दीक कौन साथी सबसे ज़्यादा अच्छा और कौन पड़ोसी सबसे ज्यादा अच्छा है। तो हुजूर अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस सवाल का यह जवाब अता फरमाया कि तमाम साथियों में अल्लाह तआला के नजदीक यह साथी सब साथियों में सबसे ज्यादा अच्छा है जो अपने तमाम साथियों के साथ अच्छा सुलूक करे। और ऐसे करीमाना व मुशफ़िकाना अन्दाज़ में उनके साथ मुआमलात और बरताव करता रहे कि उसके तमाम साथी उसको अपना बेहतरीन साथी कहने लगे। और तमाम पड़ोसियों में सबसे अच्छा पड़ोसी अल्लाह तआला के नजदीक वह पड़ोसी है जो अपने तमाम पड़ोसियों के साथ मुआमलात में ऐसे नेक बरताव के साथ पेश आये कि उसके तमाम पड़ोसी उसको अपना बेहतरीन पड़ोसी कहने लगें। हासिले मतलब यह हुआ कि जिस आदमी के सब साथी उसको अच्छा कहें और जिस पड़ोसी के तमाम पड़ोसी उसको अच्छा कहें तो तुम समझ लो कि वह आदमी अल्लाह तआला कि नज़दीक भी अच्छा ही है।

💎हज़रत अब्दुल रहमान बिन अबी करार रदियल्लाहु तआला अन्हु रावी हैं कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक दिन वुजू फरमाया तो आपके असहाब आपके वुजू के पानी को अपने हाथों में मलने लगे तो उन से नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि तुम लोगों को इस काम पर कौन चीज़ उभार रही है? लोगों ने अर्ज किया कि अल्लाह अज्जवजल और उसके रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुहब्बत। तो नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसको यह बात खुश करे कि वह अल्लाह अज्जावजल और उसके रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से मुहब्बत करे या उससे अल्लाह अज्जावजल व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मुहब्बत करें तो उसको चाहिये कि वह जब भी बात करे तो सच्ची ही बात बोले। और जब वह अमीन बनाया जाए तो वह अमानत को अदा करे। और अपने पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक और नेक बरताव करे। 
*(📚मिशकात. जिल्द, 2 सफा, 424)* 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 73,74)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣5️⃣*

*👤वह मोमिने कामिल नहीं जिसका पड़ोसी भूका रहे*

*📝हदीस :-* हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से रिवायत है कि उन्होंने कहा कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को यह फरमाते हुए सुना कि वह *(कामिल दरजे का)* मोमिन नहीं जो. खुद पेट भर कर खा ले और उसके पहलू में उसका पड़ोसी भूका रह जाये। 

*📜शरहे हदीस :-* दीने इस्लाम ने मुसलमानों पर जो हुकूक लाज़िम फ़रमाये हैं वह दो किस्म के हैं। एक अल्लाह तआला कि हुकूक, दूसरे बन्दों के हुकूक । हर मुसलमान पर अज़रुऐ शर इस्लाम इन दोनों हुकूक का अदा करना लाज़िम व ज़रुरी है। तो जो मुसलमान इन दोनो हुकूक को पूरे पूरे तौर पर अदा करे बिला शुबा उसका इस्लाम कामिल है और वह मुकम्मल दरजे का मुसलमान है। और जो इन दोनों हुकूक को पूरे पूरे तौर पर अदा न करे उसका इस्लाम यकीनन नाकिस है और मुकम्मल दरजे का मुसलमान नहीं है। 

💍बन्दों में माँ बाप भाई बहन शौहर बीवी बेटा बेटी वगैरह के हुकूक मुकर्रर हैं। इसी तरह इस्लाम ने पड़ोसियों के भी कुछ हुकूक मुकर्रर फरमाये हैं। जिनको मुकम्मल तौर पर अदा करना हर मुसलमान पर लाज़िम व जरुरी है। चुनाँचे पड़ोसियों के हुकूक में से एक हक यह भी है कि हर मुसलमान अपने पड़ोसियों के साथ बेहतरीन सुलूक करता रहे यानी उनके दुख सुख में शरीक हो कर उनकी हमदर्दी व गम खुवारी और दस्तगीरी व जाँ निसारी करे। अगर वह बीमार हों तो उनकी तीमारदारी करे। अगर वह मुलाकात को आयें तो उनकी ख़ातिर दारी करे। अगर वह गायब हों तो उनकी ख़ाना दारी करे अगर वह मुफलिस व मोहताज हों तो उनकी इमदाद व अयाल दारी करे। अगर वह भूके हों तो उन्हें खाना खिलायें। अगर वह नंगे हों तो उन्हें कपड़ा पहनाये। अगर उन पर कोई आफत व मुसीबत पड़ जाये तो उन की इमदाद व एआनत व रिफाकत व नुसरत करे। गर्ज़ हर मामला में बेहतरीन बरताव करे। अब ज़ाहिर है कि अगर कोई पड़ोसी बेचारा फाका और भूक का मारा हुआ दाने दाने को तरसता हो और उसका पड़ोसी उम्दा उम्दा और नफीस व लज़ीज़ गिज़ाएँ पेट भर कर सुख और चैन की नींद सोता रहे। तो यकीनन उस मुसलमान ने अपने पड़ोसी का हक नहीं अदा किया। और बन्दों का हक अदा करने में उसने बेपनाह कोताही और हक तलफी की। लिहाज़ा बिला शुबा उसका इस्लाम नाकिस हुआ। और वह मुकम्मल दरजे का मुसलमान कहलाने का मुस्तहक नही रहा। यही वजह है कि हुजूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने फरमाया कि " वह कामिल मोमिन नही जो खुद पेट भर कर खाले और उसके पहलू में उसका पड़ोसी भूका रह जाये।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 74,75)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣6️⃣*

*👤वह मोमिने क़ामिल नहीं जिसका पड़ोसी भूका रहे* 

*📝फवाइद व मसाइल :-* 
*(1)* मुसलमान पर अपने पड़ोसियों के साथ हर मुआमला में बेहतरीन सुलूक और अच्छा बरताव करना ज़रूरी है। कुरआन मजीद में भी पड़ोसियों के साथ भलाई करने का ख़ास तौर पर हुक्म आया है। और हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि हज़रत जिबरईल अलैहिस्सलाम हमेशा पड़ोसियों के बारे में मुझे खुदा का यह हुक्म सुनाते रहे कि उनके साथ भलाई करते रहो। यहाँ तक मुझे यह ख्याल होने लगा कि अन्करीब अल्लाह तआला पड़ोसी को उसके पड़ोसी का वारिस बना देगा। 

*(2)* पड़ोसी अगर कोई मामूली से मामूली और बिल्कुल कम कीमत चीज़ भी अपने पड़ोसी को दे तो पड़ोसी को चाहिये कि हरगिज़ हरगिज़ उसके अतिया को हकीर समझ कर न ठुकराये बल्कि उसकी दिल जोई और दिलदारी के लिए उसके अतिया को निहायत खुशी खुशी कुबूल करे। चुनाँचे हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि : " ऐ मुसलमान बीबियो ! अगर तुम्हारी पड़ोसन बकरी का एक खुर भी तोहफ़ा में तुम्हारे पास भेज दे तो हरगिज़ हरगिज़ उसको हकीर मत समझो। और अगर तुम्हारे पास अपनी पड़ोसन को देने के लिए बकरी का एक खुर ही हो तो तुम उसको तोहफे में देने के लिए हकीर समझ कर हाथ न रोक लो। बल्कि वही अपनी पड़ोसन को तोहफे मे दे दो।" एक और हदीस में तो यह भी इरशादे नबवी सल्लल्लाहु तआला अलैहि
वसल्लम हुआ है कि :"अगर तुम शोरबा पकाओ तो कुछ पानी ज़्यादा डालकर शोरबे को बढ़ा लो। ताकि उसमें कुछ अपनी पड़ोसन को देकर अपनी पड़ोसन को देकर तुम उनकी इमदाद व खबर गीरी कर सको।

*(3)* पड़ोसी के साथ सिर्फ व न पहुंचे। चुनाँचे हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने तीन मरतबा फ़रमाया कि " वल्लाहु ला यो मिन" यानी खुदा की कसम वह मोमिन(कामिल) नहीं होगा। उस पर किसी ने अर्ज किया कि कौन? या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो इरशाद फरमाया कि " अल्लजी ला योमिन जारहू बवाइकहू' यानी वह शख्स मोमिन कामिल नहीं होगा जिसका पड़ोसी उसकी शरारतों से बे ख़ौफ़ न हो जाये। 
*(📚बुख़ारी, जिल्द 2. सफा 889)*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 76,77)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣7️⃣*

*💫छ: चीज़ों के बदले जन्नत की ज‌‌‍मानत*

*📝हदीस :-* हज़रत उबादा बिन सामित रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम लोग मेरे लिए अपनी जात से छः चीजों के ज़ामिन बन जाओ। तो मैं तुम लोगों के लिए जन्नत का जामिन बन जाऊँगा।

*(1)* जब बात करो तो सच बोलो।
*(2)* जब वादा करो तो पूरा करो।
*(3)* जब तुम किसी चीज़ के अमीन बनाये जाओ तो अमानत अदा करो
 *(4)* अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करो। 
*(5)* अपनी निगाहों को नीची रखो।
(6) अपने हाथों को *(बुराई से)* रोके रखो।

*💍हजरत उबादा बिन सामित :-* इस हदीस के रावी हज़रत उबादा बिन सामित रदियल्लाहु तआला अन्हु हैं। उनकी कुन्नियत अबुल वलीद है। और यह अन्सार के कबीला बनू सालिम के बहुत ही नामवर शख्स हैं। ऐलाने नुबुव्वत के बारहवीं साल हज के मौका पर मिना की घाटी में मदीना के जिन बारह शख़्सों ने छुप कर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मुकद्दस हाथों पर बैअत की थी उनमें से एक यह भी हैं। फिर ऐलाने नुबुव्वत के तेरहवीं साल जब इसी घाटी में मदीना के बहत्तर जाँ निसारों ने बैअत की तो यह उस जमाअत में भी शामिल थे। जंगे बदर और तमाम इस्लामी जिहादों में यह मुजाहिदाना शान से शरीक हुए. बहुत ही बहादुर  थे और  आला दरजे के होश मन्द और साहिबे इल्म भी थे। अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अपने दौरे ख़िलाफ़त में मुल्के शाम का काज़ी और मुअल्लिम बना दिया था। यह पहले हमस में रहे फिर फिलिस्तीन चले गये। तिहत्तर बरस की उम्र पाकर 34 हिजरी में बमुकाम रमला या बैतुल मुकद्दस में वफात पायी। 
*( 📚इकमाल की अस्माइर रिजाल; सफा 605)* 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 77,78)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣8️⃣*

*🧭छ: चीज़ो के बदले की जमानत*

🔮इस हदीस का खुलासा मतलब यह है कि जो मुसलमान इन छः चीजों पर अमल करने का अहद करले और जामिन बन जाए तो हूजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस मुसलमान को जन्नत दिलाने की जमानत ली है। और यह गारन्टी दी है कि वह ज़रुर जन्नत में जायेगा।

*(1)🗣️सच बोलना :-* हर मुसलमान पर फर्ज़ है कि हमेशा सच बोले और हरगिज़ हरगिज़ कभी झूट न बोले। झूट बोलना गुनाहे कबीरा है एक हदीस में हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि " तुम लोग अपने लिए इसको लाजिम समझो कि सच ही बोलो क्योंकि सच्चाई तुमको नेकू कारी की तरफ ले जायेगी। और नेकूकारी तुमको जन्नत मे पहुँचा देगी। और आदमी हमेशा सच बोलता रहता है और सच्चाई ही का तलबगार रहता है तो अल्लाह अज्जा वजल के दरबार में उसके लिए सिद्दीक का लकब लिख दिया जाता है। और तुम लोग झूट से बचते रहो क्योंकि झूट तुम्हें बदकारी की तरफ ले जायेगा। और बदकारी तुमको जहन्नम में पहुँचा देगी। और आदमी लगातार झूट बोलता रहता है और झूट ही का तलबगार रहता है यहाँ तक कि वह अल्लाह तआला की बारगाह में कज्जाब लिख दिया जाता है। 

⚜️अल्लाहु अकबर ! एक मुसलमान की खुश. नसीबी की यह कितनी बड़ी मेअराज है कि परवरदिगारे आलम के दरबार से उसको सिद्दीक का मोअज्जिज़ ख़िताब मिल जाए। और वह दोनों जहान में रब्बुल आलमीन के इन्आम व इकराम की दौलतों से मालामाल हो जाये। और यह एक मुसलमान की कितनी मनहूस बदबख्ति और कितनी बड़ी नहूसत है कि अल्लाह अज्जा वजल की बारगाहे कहरो जलाल से उसको कज्ज़ाब का गन्दा और घिनौना लकब मिले और वह दोनो जहान में खुदा की मार और फटकार से जलील व खुवार हो जाए। "कज्जाब" *(बहुत बड़ा झूटा)*. यह कितना बुरा और किस कदर काबिले नफरत खिताब है। इसको समझने के लिए इस हदीस को पढ़िये जिसके रावी हज़रत सफ़वान बिन सलीम ताबेई हैं कि :
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 60,61)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 4️⃣9️⃣*

    *💦छः चीज़ो के बदले की जमानत* 

💫 किसी सहाबी ने बारगाहे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में अर्ज़ किया कि क्या मोमिन बुज़दिल और डरपोक हो सकता है ? तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हाँ। फिर किसी ने गुज़ारिश की कि क्या मोमिन कन्जूस हो सकता है ? तो आपने इरशाद फरमाया कि हाँ। फिर किसी ने दरयाफ्त किया कि क्या मोमिन कज़्ज़ाब *(बहुत बड़ा झूठा हो सकता है )*? तो हुजूर ने फ़रमाया नहीं मतलब यह है कि काज़िब यानी कभी कभी इत्तिफ़ाकिया या बवक्ते ज़रुरत झूट बोलने वाला तो मोमिन कहलायेगा मगर कज्जाब जो हमेशा हर बात में झूट ही बोले वह इस लायक नहीं कि उसको मोमिन कहा जाए। क्योंकि कज्जाब होना हरगिज हरगिज़ कामिलुल ईमान मुसलमान की शान नहीं है।

*(2) 👤वादा पूरा करना :-* मुसलमान किसी से कोई वादा करे तो उस वादे को पूरा करना मुसलमान का इस्लामी फरीज़ा है। मुकद्दस कुरआन में खुदा वन्द कुद्स का फरमान है “ऐ ईमान वालो अपने वादों को पूरा करो"। इस्लाम में वादा पूरा करने की अहमियत का अन्दाजा लगाना हो तो मुकद्दस रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सीरते मुबारका का यह शाहकार याद करलो और नुबुब्बत के इस इबरत खेज़ और नसीहत आमोज़ आला किरदार को कभी फरामोश न करो। सीरते नबविया सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की किताबों में यह हदीस है 

⚜️हज़रत इब्ने अबिल हस्मा रदियल्लाहु तआला अन्हु का बयान है कि ऐलाने नुबुव्वत के कब्ल मैंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से कोई सामान ख़रीदा तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कुछ रकम मेरे ज़िम्मे रह गई और मैंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से वादा किया कि मैं वह रकम इस जगह अभी अभी लेकर आता हूँ लेकिन मैं बिल्कुल भूल गया। फिर तीसरे दिन मुझे याद आया और मैं जब यह रकम लेकर उस जगह पहुँचा तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उसी जगह पाया और आप ने मुझ से सिर्फ इतना फ़रमाया कि तुमने मुझे मशक्कत में डाल दिया क्योंकि तीन दिन से मैं इसी जगह तुम्हारा इन्तिज़ार कर रहा हूँ।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 79,80)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣0️⃣*

*☀️छः चीज़ो के बदले की जमानत*

*(3)💍अमानत की अदायगी :-* अमानत की अदायगी फर्ज है। और बाल बराबर भी किसी अमानत में खयानत करना हराम और गुनाहे कबीरा है कुरआन का फरमान है कि यानी अपनी अमानतों में जान बुझकर   ख्यानत न करो

💫याद रखो कि अमानत सिर्फ माल और सामान ही की नहीं होती बल्कि अगर तुम्हे किसी बात या किसी राज़ का अमीन बना दे तो यह बात और राज़ भी अमानत है इसमें भी खयानत हराम और गुनाहे कबीरा है। मसलन मियाँ बीवी बवक्ते मुबाशरत तन्हाई में जो कुछ कहते या करते हैं इस मामले में औरत मर्द की अमीन और मर्द औरत का अमीन है। अगर औरत या मर्द ने अपने राजों को फाश कर दिया तो अमानत में ख्यानत करने का गुनाह लाज़िम होगा


*(4) शर्मगाहों की हिफाजत :-* इस का मतलब यह है कि जिनाकारी से बचने का अहद करलें और हरगिज़ हरगिज़ अपनी शर्मगाहों को इस गुनाहे अज़ीम से आलूदा न करें। बल्कि हमेशा अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करते रहें। निगाहों को नीची रखना :- इससे मुराद यह है कि जिन चीज़ो को देखना शरीअत मुतहरा ने हराम करार दे दिया है हरगिज़ उन पर कभी नजर न डाले। बल्कि अपनी निगाहों को नीची रखे ताकि हराम चीज़ो पर नज़र न पड़ सके। मसलन गैर महरम औरतों को देखना या नाच देखना। या सिनेमा वगैरह वे हयाई की तस्वीरों, अखलाक को ख़राब करने वाले मनाज़िर देखना या मुसलमानों के छिपे हुए की ताक झाँक कर देखना या कुफ्र व मासी और फवाहिश व मुन्किरात के मज़ामीन वाली किताबों को देखना यह सब हराम हैं और इन सब महारिम से अपनी निगाहों को नीची रखना लाज़िम और याजिबुल अमल है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 80,81)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣1️⃣*

*♻️छः चीज़ो के बदले की जमानत*

*(6)🤚🏻हाथों को रोके रखना :-* इसका मकसद यह है कि मुसलमान अपने हर हर अज़्व बल्कि बदन की बोटी बोटी पर कन्ट्रोल रखे कि हरगिज़ हरगिज़ उससे कोई बुराई और ख़िलाफ़े शरीअत काम न होने पाये। हाथ को रोके रहने का यह मतलब नही कि सिर्फ हाथों को गुनाह और बुराई से बचाए रखे। और बदन के दूसरे आज़ा को आज़ाद छोड़ दे। चूंकि इन्सान के ज़्यादा तर काम हाथों ही से अन्जाम पाते हैं। इसलिए मिसाल के तौर पर इस हदीस में हाथों को बुराई से रोके रखने का ज़िक्र आया है। लेकिन हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की मुराद यही है कि मुसलमान अपने हर हर अज्व को गुनाहों से रोके रखे। चुनाँचे कुरआन मजीद में रब्बुल आलमीन का फरमान है किं  *तर्जुमा :-* कान आँख दिल हर हर अज्व से इसके कामों के बारे में कयामत के दिन पूछ गछ की जायेगी और उसके आमाले खैर व शर का हिसाब लिया जायेगा।

*📝तबसरा :-* हदीसे मजकूरा बाला में जिन जिन चीज़ो पर अमल करने के बदले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को जन्नत मिलने की ज़मानत ली है गौर कीजिए कि इन बातों पर अमल करना कुछ ज़्यादा मुश्किल काम नहीं। न इन कामों में माल का खर्च है न जिस्मानी मेहनत दरकार है। हर मुसलमान बा आसानी इन पर अमल करके जन्नत का हकदार हो सकता है मगर यह कितना अजीब और हैरत नाक सानेहा है कि बावजूद कि हर मुसलमान जन्नत का मुश्ताक और तमन्नाई बल्कि हरीस है मगर जन्नत को दिलाने वाले उन आमाल से न सिर्फ कोसों दूर बल्कि इन महारिम खुसूसन झूट, वादा खिलाफी ख्यानत वगैरह की बलाओं में बुरी तरह गिरफ्तार है कि मुस्लिम मुआशरा की।इफ्फत व अज़मत और उसके तकदुस की परचमों की धज्जियाँ पारा पारा होकर फिज़ाए आसमानी में बिखर चुकी हैं। और अक्वामें आलम की निगाहों में इस्लाम और मुसलमानों का वकार तहस नहस होकर रह गया है। फिस्क व फुजूर का तो ज़िक्र ही क्या है हद हो गई कि जमाना-ए-हाल के बाज़ उल्मा व मशाइख का दामने तकद्दुस भी किज्ब बयानी, वादा खिलाफी और किस्म किस्म की ख्यानतों के बदनुमा धब्बों से दागदार नज़र आ रहा है। खुदावन्द करीम सबको इन गुनाहों से तौबा और आमाले सॉलेहा की तौफीक अता फरमाये। और हर मुसलमान को जन्नत नसीब फरमाये। आमीन।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 80,81)*
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*♻️दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣2️⃣*

      *👥मेहमान नवाज़ी*

*💫हदीस नम्बर 1 :-* हज़रत अबू शरीह रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हज़रत नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स अल्लाह तआला और कयामत पर ईमान रखता है तो उसको चाहिये कि अपने पड़ोसी के साथ अच्छा बरताव करे और जो शख्स अल्लाह तआला और कयामत पर ईमान रखता है तो उसको चाहिये कि अपने मेहमान को ऐजाज़ करे। और जो शख्स अल्लाह तआला और कयामत पर ईमान रखता है तो उसको चाहिये कि अच्छी बात बोले या चुप रहे।

*👀हदीस नम्बर 2 :-* हज़रत अबू शरीह अदवी रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि मेरी दोनों आँखों ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देखा। और मेरे दोनों कानों ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सुना जिस वक़्त आपने इन कलिमात को इरशाद फरमाया। आपने यह इरशाद फरमाया कि जो शख्स अल्लाह तआला और कियामत पर ईमान रखता है उसको चाहिये कि अपने मेहमान की इज्जत उसको जायज़ा देकर करे। इस पर लोगों ने कहा कि मेहमान का जायज़ा क्या है ? तो आपने फरमाया कि एक दिन और एक रात । और मेहमानी तीन दिन है और उसके बाद जो कुछ है वह सदका होगा। और जो शख्स अल्लाह तआला और कियामत पर ईमान रखता है तो उसको चाहिये कि कोई अच्छी बात बोले या चुप रहे।

*📝हदीस नम्बर 3 :-* हजरत अबू शरीह कअबी रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि बेशक रसुलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मेहमानी तीन दिन है और मेहमान का जायज़ा *(पुर तकल्लुफ पकवान)* एक दिन और एक रात है। और इसके बाद जो इत्तिफाक पेश आये तो वह सदका है और मेहमान के लिए यह हलाल नहीं है कि वह इतने दिनों तक ठहरा रहे कि मेज़बान को तंग कर डाले।

*📜हजरत अबू शरीह :-* मजकूरा बाला तीनों हदीसों में तीन जग अबू शरीह रावी का जिक्र है। मुस्लिम  
शरीफ में अबू शरीह है और तिरमिज़ी की एक रिवायत में अबू शरीह अदवी है और दूसरी रिवायत अबू शरीह कअबी है 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 81,82)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣3️⃣*

 *👥मेहमान नवाज़ी*

💫वाजेह रहे कि यह तीनों एक ही शख्स हैं। अबू शरीह इन की कुन्नियत है और यह अपनी कुन्नियत ही से ज्यादा मशहूर हैं। इनका नाम क्या है? इस बारे में मुहद्दिसीन के पाँच अकवाल हैं। बाज ने कहा कि इन का नाम खुवैद बिन अम्र है और बाज़ का कौल है कि अम्र बिन खुवैद है। और बाज़ के नज़दीक अब्दुर्रहमान नाम है। और बाज़ ने इनका नाम हानी बिन अम्र बताया है। और बाज़ कहते हैं कि इन का नाम कअब है। इसी तरह यह तीन।निस्बतों के साथ मशहूर हैं। कुछ लोग इनको अबू शरीह ख़ज़ाई कहते हैं कुछ लोग इनको अबू शरीह अदवी कहते हैं। और कुछ लोग अबू शरीह 
कअबी कह कर इनका जिक्र करते हैं 

⚜️"इकमाल फी अस्माइर रिजाल" में उनका तजकिरा इन लफ्ज़ों में आया है कि अबू शरीह खुवैद बिन अम्र कअबी अदवी ख़जाई यह फतहे मक्का से पहले ही मुसलमान हो गये थे। हिजाज के असातिजा हदीस में इनका शुमार है और मुहदिसीन की एक जमाअत ने इन की शागिर्दी का शरफ पाया है। यह बुजुर्ग और बुलन्द मरतबा सहाबी हैं। 68 हिजरी में मदीना मुनव्वरा के अन्दर इनकी वफात हुई। 

*📝शरहे हदीस :-* मुस्लिम शरीफ की हदीस का खुलासा यह है कि हर मुसलमान को तीन चीज़ों का खास तौर पर एहतिमाम करना चाहिये
 *(1)* अपने पड़ोसी के साथ नेक सुलूक 
और अच्छा बरताव करे।
*(2)* अपने मेहमान का ऐजाज व इकराम करे।
*(3)* जब कभी बोले तो अच्छी बात बोले वरना खामोश रहे। तिरमिजी शरीफ की पहली हदीस का भी यही मतलब है मगर इसमें एक बात बढ़ी हुई है कि मेहमान को इस का जायजा देकर इसकी इज्जत अफजाई करे। मेहमान का जायज़ा मतलब यह है कि उसके लिए खुसूसी तौर पर मेज़बान एहतिमाम के साथ अपनी वुसअत व ताकत के मुताबिक अच्छे से अच्छा खाना तैयार करे। जब लोगों ने अर्ज किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! मेहमानों के लिए खुसूसी और उम्दा खानों का सिलसिला कितने दिनों तक जारी रखना चाहिये। तो आपने इरशाद फरमाया कि एक दिन और एक रात यह मेहमान का हक है। और ज़्यादा से ज़्यादा मेहमानदारी और मेहमान नवाज़ी की मुद्दत तीन दिन है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 82,83)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣4️⃣*

        *👥मेहमान नवाज़ी*

🥣मगर एक दिन और एक रात के बाद मेज़बान को पुर तकल्लुफ और उम्दा खाना तैयार कराना लाज़िम नहीं हैं। बल्कि हस्बे मामूल जो खुद खांता है वही मेहमान को भी खिलाऐ। यह भी मेहमान का हक है। लेकिन मेहमान तीन दिनों के बाद जो खायेगा वह उसका हक नहीं है बल्कि मेज़बान की तरफ से वह सदका है जो मेहमान खा  रहा है।

⚜️और तिरमिज़ी शरीफ की दूसरी हदीस का हासिल यह है कि मेहमान को लाज़िम है कि ज्यादा से ज़्यादा तीन दिन ठहरे। और अगर मेज़बान की तंगी और हर्ज में पड़ जाने का अन्देशा हो तो तीन दिनों से ज्यादा मेहमान को ठहरना जाइज़ व हलाल नहीं। हाँ अगर मेज़बान क़ोफ्त और तंग दिली में न पड़े बल्कि निहायत खुश दिली के साथ मेहमान को तीन दिन से ज्यादा ठहराये तो यह जाइज़ है। लेकिन बहर हाल यह ज़रुर है कि मेहमान तीन दिनों से ज़्यादा ठहर कर जो खायेगा वह मेहमान का हक नहीं है बल्कि मेज़बान का एहसान और सदकए नाफिला है जिसका मेज़बान को अजरो सवाब मिलेगा।

*🗣️अच्छी बात बोले वरना चुप रहे :-* इसका मतलब यह है कि मुसलमान को लाज़िम है कि बोलने से पहले यह सोच ले कि अगर इस बात से खुद को या दूसरे को कोई नुकसान व ज़रर नहीं पहुँचेगा तो उस बात को ज़बान से निकाले। और अगर उस  बात से कोई ज़रर व नुकसान पहुंचने का अन्देशा हो तो हरगिज़ हरगिज़ उस बात को न कहे। बल्कि खामोश रहे उसकी यह खामोशी बोलने से हज़ारों दरजे बेहतर है।

*💫फायदए जलीला :-* शैख़ अबू मुहम्मद अब्दुल्लाह बिन अबी ज़ैद जो अपने दौर में बिलादे मगरिब के इमामुल मालकिया कहलाते थे, फरमाया करते थे कि मेरी नज़र में चार हदीसें ऐसी हैं जिन में तमाम आदाबे खैर के ख़ज़ाने जमा हैं। और जो इन चार हदीसों पर अमल करेगा वह खैर और भलाई के तमाम ख़ज़ानों को जमा करेगा। वह चार हदीसें यह हैं  *(1)* अच्छी बात बोलो वरना खामोश रहो। *(2)* आदमी के इस्लाम की खूबी से यह बात है कि तमाम उन बातों को छोड़ दे जिनसे उसको कोई फायदा और गर्ज न हो। *(3)* हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने एक शख्स को निहायत मुख्तसर वसीयत फरमाते हुए इरशाद फ़रमाया कि किसी पर गुस्सा न करो। *(4)* इस वक्त तक तुम में से कोई कामिलुल ईमान नहीं होगा यहाँ तक कि वह अपने *(दीनी)* भाई के साथ वही चीज़ पसन्द करे जो अपने लिए पसन्द करता है ख़ामोशी बेहतर है या कलाम करना अच्छा है इस मामले में उस्ताजुस सूफिया हज़रत अबुल कासिम कुशैरी अलैहिर्रहमा का एक बेहतरीन मकूला है कि ख़ामोशी के वक्त चुप रहना मरदाने खुदा का तरीका है जैसा कि कलाम के मौका पर बोल देना निहायत ही अशरफ ख़सलत है। और कबीरुल औलिया हज़रत अबू अली दक्काक अलैहिर्रहमा फरमाया करते थे कि  जो हक बात कहने से ख़ामोश रहे वह गूंगा शैतान है' खुलासए कलाम यह है कि न हर हाल में खामोशी बेहतर है और न हर हाल में बोलना बेहतर है। बल्कि दोनों अपने अपने महल और मौका पर अफ़ज़ल हैं। जहाँ ख़ामोशी का मौका और महल हो वहाँ ख़ामोश रहना बेहतर और अच्छा है और जहाँ बोलने का मौका हो वहाँ बोलना बेहतर और अच्छा है। हाँ अलबत्ता फरमाने हदीस है कि बमोजिब यह ध्यान रखना जरुरी है कि जो कुछ बोले वह अच्छी बात हो बुरी बात न हो। वल्लाहु तआला अअलम।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 83,84)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣5️⃣*

       *💎दीन ख़ैर ख्वाही है*

*💫हदीस :-* हज़रत तमीम दारी रदियल्लाहु तआला अन्हु से मन्कूल है कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि दीन खैर ख्वाही है तो हम लोगों ने कहा कि किस के लिए? तो फ़रमाया कि अल्लाह अज़्ज़वजल के लिए और उसकी किताब के लिए और उसके रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए मुसलमानों के इमामों और आम मुसलमानों के लिए।

*♻️हज़रत तमीम दारी :-* इन का नाम तमीम बिन औस है और कुन्नियत अबू रुकय्या। यह तमीम दारी भी कहलाते हैं। और बाज़ लोग उनको तमीम देरी भी कहते हैं। दारी कहलाने की वजह यह है कि इनके दादाओं में एक शख्स का नाम दार बिन हानी था। इसी की तरफ़ निस्बत करके उनको दारी कहा जाने लगा। और देरी इस लिए कहलाते हैं कि यह मुसलमान होने से पहले दैर गिरजाघर में रहा करते थे। क्योंकि पहले यह नसरानी थे। नौ हिजरी में मुशर्रफ बा इस्लाम होकर मदीना मुनव्वरा की सुकूनत इख्तियार कर ली। इबादत गुजार सहाबा में इनका शुमार है। यह नफ्ल नमाज की एक रकअत में पूरा कुरआन मजीद ख़त्म कर लिया करते थे। मुहम्मद बिन मुन्कदिर मुहदिस का बयान है कि एक रात यह सोते रह गये और उनकी नमाज़े तहज्जुद कजा हो गई तो यह अपने नफ्स को सज़ा देने के लिए मुकम्मल एक बरस तक रात भर जागते रहे। अमीरुल मोमिनीन हज़रत उस्मान गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत के बाद यह मदीना मुनव्वरा से जाकर मुल्के शाम में आबाद हो गये। यहाँ तक कि वहीं उनकी वफात हो गई। इनके फज़ाइल में खास तौर पर इनकी दो खूबियों का हदीसों में तज़किरा आया है। एक यह कि सब से पहले उन्होनें मस्जिदे नबवी में कन्दीले जलाकर रौशनी की, इससे पहले किसी ने मस्जिदे नबवी में चिराग नहीं जलाया था। दूसरी यह कि इन्होंने दौराने सफ़र एक जज़ीरा में दज्जाल और उसके जासूसों को देखा। चुनाँचे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन्हीं की ज़बान से सुनकर दज्जाल और जसासा का वाकेआ सहाबा किराम को सुनाया। जो हदीस की किताबों में मजकूर है सहाबा किराम की एक जमाअत ने इन से हदीसे रिवायत की हैं जिनमें हज़रत अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु खास तौर पर काबिले जिक्र हैं।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 84,85)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣6️⃣*

         *❣️दिन  ख़ैर ख्वाही है* 

*💫शरहे हदीस :-* हदीस में नसीहतुन को दीन फरमाया गया इसका मतलब यह है कि नसीहत दीन की एक बहुत ही बड़ी और निहायत ही अज़ीम खसलत है कि गोया कि यह दीन का दारोमदार है और दीन की इमारत का एक मज़बूत व मुस्तहकम सुतून है। जिस तरह एक हदीस में यह इरशाद फरमाया गया कि “ अल हज अरफतुन" यानी हज अरफा है। तो इसका मतलब यही है कि यूँ तो अफ़आल व अरकाने हज चन्द चीजें हैं मगर हज का इन्तेहाई अहम रुकन ज़िल हिज की नौ तारीख को मैदाने अराफात में वकूफ़ करना है। इस तरह इस हदीस का मतलब भी यही है कि यूँ तो दीन के खसाइल बहुत ज़यादा हैं मगर दीन की तमाम खसलतों में नसीहत एक बहुत की अज़ीमुश्शान और निहायत अहमियत वाली ख़सलत है बल्कि दर हकीकत यह ऐसी शानदार खसलत है कि बहुत सी दीन की ख़सलतों की जामे बल्कि अक्सर खसाइले इस्लाम का इस पर दारो मदार है। चुनाँचे सहावा किराम ने नसीहत की इस अहमियत को सुनकर दरबारे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में अर्ज़ किया कि या रसूलल्ला सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! किस के लिए खैर ख्वाही करना दीन की एक अहम और आज़म ख़सलत है? तो आपने फरमाया कि पाँच जातों के लिए

*(1)* अल्लाह तआला के लिए।
*(2)* उसकी किताब के लिए।
*(3)* उसके रसूल के लिए।
*(4)* मुसलमानों के इमामों के लिए।
*(5)* आम मुसलमानों के लिए। अब हर एक के लिए खैर ख्वाही की अलग अलग तफसील मुलाहिज़ा फरमाईये। कि उन में से हर एक के लिए खैर ख्वाही किस तरह होगी? अब इस सिलसिले में हम अपनी तरफ से कुछ तहरीर करने के बजाऐ मुनासिब यह समझाते हैं कि इमाम ख़ताबी अलैहिर्रहमा की इस तकरीर का खुलासा दर्ज करदें। जो उन्होने इस हदीस की शरह में बयान फरमाया है और जिसको मुहिय्युद्दीन अबू जकरिया शैख़ याहय्या बिन शरफ नौवी अलैहिरहमा ने अपनी शरह मुस्लिम में नकल फरमाया है।

*(1)📝अल्लाह तआला के लिए खैर ख्वाही:-* अल्लाह तआला के लिए खैर ख्वाही का मतलब यह है कि 
अल्लाह तआला की ज़ात व सिफात पर ईमान लायें। और उसकी तौहीद  पर सिदक दिल से ईमान लाकर जबान से उसका इकरार व ऐलान  करे। और उसकी जात व सिफात में शिर्क व इल्हाद से बराअत व बेज़ारी का इज़हार करें। और उसकी इताअत व फरमाँ बरदारी में कमर बस्ता होकर उसकी मसियतों से एहतिराज व इजतिनाब रखें। उसके मुहिब्बीन से  मुहब्बत और उसके आदाऐ लईन से बुग्ज़ व नफरत करें। उसकी दी हुई नेअमतों का ऐतराफ करके अपने।दिल अपनी ज़बान अपने आज़ा से।उसका शुक्र करें और उसकी भेजी हुई मुसीबतों पर सब करके उसकी हम्द करें।

*♻️तन्बीह :-* याद रखो कि अल्लाह तआला के लिए इस खैर नाही करने का नफा व लाइदा दर हकीकत बन्दे ।ही को मिलेगा। इसलिए कि खुदा के लिए यह बैर नाही करके हकीकत में बन्दा अपने ही लिए खैर ख़ाही करता है वरना अल्लाह तआला अपने बन्दों 
की खैर ख़ाही से गनी व मुस्तसना और बे नियाज़ है। कुरआन करीम में अल्लाह तआला ने बार बार अपने इस फरमान का ऐलान फरमाया है कि 
अल्लाह तआला तमाम उहान वालों से बे नियाज है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 85,86)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣7️⃣*
           
      *💎दिन ख़ैर ख्वाही है*

*📝2,किताबुल्लाह के लिए ख़ैर ख्वाही करना :-* इसका मतलब यह है कि कुरआन मजीद के तमाम अहकाम पर ईमान लाए और इस मुकद्दस किताब को खुदा की किताब मानकर यह अकीदा रखे कि हर गिज़ हरगिज़ कोई जिन व इन्सान इस किताबे मुकद्दस के मिस्ल एक आयत भी बना कर नहीं ला सकता। फिर इसी अकीदा के साथ इस किताब की ताज़ीम व तकरीम करे। और निहायत ही खुजू व खुशू और इखलास के साथ इस किताबे मजीद की तिलावत करता रहे। और इसके अवामिर व नवाही पर सिद्क दिल से ईमान लाकर इस पर अमल करे। और इसके तालीम व तअल्लुम में अपनी ताकत भर कोशिश करता रहे और लोगों को कुरआनी अहकाम पर अमल करने की दावत देता रहे।

*💫3,रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए खैर ख्वाही :-* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए ख़ैर ख्वाही से मुराद यह है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ख़तिमुन्न नबीयीन मान कर उनकी रिसालत पर ईमान लाए।।और वह जो कुछ लाए।दिल से उसकी तस्दीक और ज़बान से उसका इकरार व ऐलान करे। और उनकी ताजीम व तौकीर करे। और अपनी जान से भी बढ़कर उनसे।मुहब्बत करे। और उनकी सुन्नतों पर खुद अमल करके उनकी दावत व शरीअत की एक एक बात उन की ज़ात व सिफ़ात, उनकी सूरत व सीरत उनके असहाब उनकी अजवाज व औलाद बल्कि हर उस चीज़ से मुहब्बत व उल्फत रखे जिनको खुदा के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से तअल्लुक हो। और उनके दुश्मनों से दुश्मनी और उनके दोस्तों को दोस्त रखे। उनकी हदीसों और फ़रमानों का इकराम वं एहतिराम करते हुए दिल व जान से उन पर अमल करे और दूसरों को उन पर अमल करने की दावत देता रहे। और उनकी इज्ज़त व अज़मत के लिए अपनी जान, अपना माल, अपनी आल व औलाद को उन पर कुरबान कर देने का जज्बा रखे।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 87,88)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣8️⃣*

            *❣️दिन ख़ैर ख्वाही है* 

*(4) 📝अइम्मतुल मुसलेमीन की ख़ैर ख्वाही :-* इसके माने यह है कि मुसलामानों का अमीरुल मोमिनीन जब तक हक पर कायम रहे और वह उनको अल्लाह अज़्जवजल व रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इताअत का हुक्म देता रहे तो तमाम मुसलमानों पर लाज़िम है कि उस अमीरुल मोमिनीन की बैअत पर कायम रहें और उसकी इताअत व फ़रमाँ बरदारी करते रहें। और उसका दिल से इकराम व एहतिराम भी करते रहें। और हरगिज़ हरगिज उसके खिलाफ न बगावत करें। और न उसके अहकाम की नाफरमानी करें। बल्कि उसकी इक्तिदा में नमाज़ पढ़ें और उसके हुक्म पर कुफ्फ़ार से जिहाद करें। और अपने मालों की जकातं और उश्रर वगैरह उसके बैतुल माल में देते रहें। और हर तरह उसकी मुआविनत करें। हाँ अगर खुदा ना ख्वास्ता कोई अमीरुल मोमिनीन।अल्लाह अज्जवजल व रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के खिलाफ।कोई हुक्म दे तो मुसलमानों पर।इसकी इताअत लाज़िम नहीं क्योंकि हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का फरमान है। ला ताअता लिमख़्लूकिन फी मअसियतिल खालिक यानी खालिके कायनात जल्ला जलालुहू की मसियत और नाफरमानी में किसी मखलूक. की इताअत जाइज नहीं। यह तकरीर उस वक्त है जब कि अइम्मतुल मोमिनीन से मुराद अमीरुल मोमिनीन और खुल्फा हों। और अगर अइम्मतुल मुस्लेमीन से उल्माए दीन और अइम्मए मुजतहेदीन मुराद हों तो उनकी खैर ख्वाही का यह मतलब होगा कि तमाम मुसलमान उल्माए।दीन का इकराम व एहतिराम करें।।और दीनी मसाइल में उन पर एतिमाद करके उनके बताए हुए फतावे और मसाइल पर अमल करें। और कभी।हरगिज़ हर गिज़ उनकी बे हुरमती न करें। बल्कि हर वक्त उनके अदब व।एहतिराम को मलहूज़ रखें और उनकी नुसरत व हिमायत और इमदाद व एआनत में कमर बस्ता रहें।

*(5)👥आम्मतुल मुसलेमीन की खैर ख्वाही :-* आम्मतुल मुस्लेमीन की खैर ख्याही यह है कि हर मुसलमान हर एक मुसलमान को अपना दीनी भाई समझे और उसको हर किस्म की तकलीफों से अपनी ताकत भर बचाए रखे। और हर मुसलमान के लिए वही पसन्द करे जो अपने लिए पसन्द करता है और जिन चीज़ों को अपने लिए ना पसन्द समझता है हर मुसलमान के लिए भी उसको ना पसन्द समझता। हर मुसलमान हर एक मुसलमान पर शफीक बन कर उसको अच्छी बातों का हुक्म देता रहे। और बुरी बातों से रोकता रहे। और हर मुसलमान हर एक मुसलमान के खून और उसके माल और उसकी आबरु की हिफाज़त करे। हर छोटा बड़ों की ताज़ीम व तौकीर करे और हर बड़ा अपने छोटों पर शफकत व रहमत  करे। कोई मुसलमान मुसलमान को न ईजा दे न धोका दे न हसद करे। बल्कि जहाँ तक हो सके हर मुसलमान हर एक मुसलमान की मदद करे और ख ख़ैर ख्वाही में कोशिश करता रहे
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 88,89)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 5️⃣9️⃣*

         *♻️दिन ख़ैर ख्वाही है* 

📝यह हदीस अगरचे इसके अल्फाज़ बहुत कम हैं मगर इसके दामन में मआनी व मतालिब का इतना बड़ा ख़ज़ाना पोशीदा है कि अगर मुसलमान इस हदीस पर अमल करने लग जाएं तो उनके दीन व दुनिया के हुस्न में एक खूबसूरत निखार पैदा हो जाए। और मुस्लिम मुआशरा इस क़दर सुधर जाए कि उसकी नूरानियत में चार चाँद लग जाएं और गैर मुस्लिम अक़वाम के लिए इस्लामी मुआशरा में ऐसी कशिश पैदा जो जाए कि वह उसके हुस्न व जमाल में शमआ के परवाने बन जाएं। लेकिन अफसोस सद अफ़सोस कि मुसलमानों की गफलत और बे हिसी और उनके जमूद व ख़मूद को देख देख कर दिल जलता है और बार बार यह कतआ पढ़ पढ़ कर घुटता और कुढ़ता रहता हूँ 


*📝तर्जुमा :-* अगर तू किसी ज़िन्दा को पुकारता तो वह जरुर जवाब देता लेकिन तू जिसको पुकार रहा है उसमें तो कोई ज़िन्दगी ही नहीं है फिर भला वह कैसे जवाब देगा? अगर तू आग में फूंक मारता तो वह जरुर रौशन हो जाती लेकिन तू जिसमें फूंक मार रहा है वह तो राख है भला कैसे रौशन हो सकती है? हाये इस दौर में मुसलमान ज़िन्दा नहीं रहा बल्कि मर गया हाये मुसलमान इस ज़माने में आग नहीं बल्कि राख 
हो चुका है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 89,90)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣0️⃣*

*💎रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सात वसीयतें हदीस :-* हजरत अबू जर गफ्फारी रदियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि मैनें कहा कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! आप मुझको कोई वसीयत फरमायें तो आप ने फरमाया कि मैं तुम को अल्लाह से डरते रहने की वसीयत करता हूँ। क्योंकि यह तुम्हारे कामों को बहुत ज़्यादा संवार देने वाली चीज़ है। तो मैंने कहा कि कुछ वसीयतें फरमाईये। तो आप ने फरमाया कि तुम कुरआन की तिलावत और ज़िक्रे इलाही को अपने लिए लाज़िम कर लो। क्योंकि इससे आसमान में तुम्हारा जिक्र होगा। और जमीन में यह तुम्हारे लिए नूर बनेगा। 
मैंने कहा कि कुछ और ज़्यादा फरमाईये? तो फरमाया कि तुम तवील खामोशी को लाज़िम पकड़ो क्योंकि यह शैतान को बहुत ज्यादा फटकारने वाली चीज़ है। और यह तुम्हारे दीनी कामों में तुम्हारे लिए मददगार होगी। मैंने कहा कि कुछ और ज़्यादा फरमाईये? तो फरमाया कि बहुत ज़्यादा हँसने से बचो क्योंकि यह दिल को मुर्दा और चेहरे के नूर को गारत कर देता है। मैंने कहा कि मुझे कुछ और ज़्यादा फ़रमाईये? तो फरमाया कि तुम हक बात बोल दिया करो अगरचे लोगों को कड़वी लगे। मैंने कहा कि कुछ और ज्यादा मुझे।बताईये? तो आपने फरमाया कि तुम अल्लाह अज्जवजल के मामले में किसी मलामत करने वाली की मलामत से न डरो। मैंने कहा कि मुझे कुछ और ज़्यादा बताईये? तो आपने फरमाया कि तुम लोगों के ऐबों को बयान करने से ज़बान को रोके रखो। जिसके बारे में तुम जानते हो कि वह उयूब खुद तुम्हारी ज़ात में मौजूद हैं।
 *(📚 मिश्कात ज़िल्द , 2 सफाह , 415)*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा,  90,91)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣1️⃣*

*👑रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि  वसल्लम की वसीयतें*

*💫हज़रत अबू जर गफ्फारी :-* इस हदीस के रावी हज़रत अबू ज़र गफ्फारी रदियल्लाहु तआला अन्हु हैं यह बहुत ही जलीलुल कद्र और निहायत ही बुलन्द मर्तबा आबिद व ज़ाहिद सहाबी हैं। इब्तिदाऐ इस्लाम ही में यह मुसलमान हो गये थे यहाँ तक कि बाज़ मुअरेख़ीन का कौल है कि इन से पहले सिर्फ चार आदमियों ने इस्लाम कबूल किया था यह पाँचवें मुसलमान हैं। इस्लाम कबूल करने के बाद हुजूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम।की इजाज़त से अपने वतन जाकर अपनी कौम में रहने लगे। फिर जंगे ख़न्दक के बाद मदीना आकर बारगाहे रिसालत में हाज़िर बाश हो गये। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बाद यह कुछ दिनों के लिए  मुल्के शाम जाकर इकामत पज़ीर हो गये। मगर शाम के गवर्नर हज़रत अमीर मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु से उनकी नहीं बनी। इस लिए फिर मदीना मुनव्वरा चले आये और फिर अमीरुल मोमिनीन हज़रत उस्मान गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु के हुक्म से मदीना मुनव्वरा से चन्द मील दूर जुब्दा नामी एक छोटे से गाँव में घर बना कर रहने लगे। यहाँ तक कि *32* हिजरी में इसी गाँव के अन्दर आपने वफ़ात पायी। सहाबा किराम के जुहदो तकवा का बेहद चर्चा था। आप इबादत व रियाज़त में भी बहुत मशहूर थे। हक गोई में आप किसी से मरऊब नहीं होते थे। और सहाबा किराम का बेहद एहतिराम करते थे। ज़माना जाहिलयत में इस्लाम कबूल करने से पहले भी यह "मुवह्हिद" *(खुदा को एक मानने वाला)* थे। और एक खुदाऐ वाहिद की इबादत किया करते थे। सहावा व ताबेईन की एक बड़ी जमाअत ने हदीस में इनकी शागिर्दी का शरफ पाया है।

*💎शरहे हदीस :-* मजकूरा बाला हदीस का खुलासा यह है कि हज़रत अबू जर गफ्फारी रदियल्लाहु तआला अन्हु ने दरबारे रिसालत में अर्ज़ किया कि या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! आप मुझे कुछ वसीयतें फरमायें और यह सातों वसीयतें इतनी जामे और मुकम्मल हैं कि दर हकीकत कयामत तक आने वाली उम्मते मुस्लिमा के हर हर फर्द के लिए सलाह व फलाह और दीनी मसाइल व इस्लामी खसाइल के वह खज़ाने हैं जिनकी मिसाल नहीं मिल सकती। और बिला शुबा यह सातों वसीयतें खुदा शनासी और खुदा रसी और फलाहे दारैन की मन्ज़िल के लिए ऐसी सात शाहराहें हैं कि जिन पर चलने वाला यकीनन मन्ज़िले मकसूद तक पहुँचेगा। और कभी हरगिज़ नहीं फटकेगा। न बहकेगा। क्योंकि यह शाहराहें सिराते मुस्तकीम की वह सीधी सड़कें है जिन में न कोई कजी है न कोई मोड़ है बल्कि यह सीधी मन्ज़िले मकसूद तक पहुँचाने वाली राहें हैं। अब इन सातों वसीयतों का खुलासा मुलाहिजा फरमा कर इन पर अमल की कोशिश फ़रमाइये। खुदावन्द करीम हम और आप और सब मुसलमानों को इसकी तौफीक अता फरमाये। आमीन

*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 91,92)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣2️⃣*

*🔮रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम* 

*(1) 🕋खुदा से डरना :-* तक़वा और ख़ौफे इलाही ज़ाहिर है कि जो शख्स इस नेअमते उजमा से सरफराज़ होगा उसके दीन व दुनिया के किसी काम में न कजी होगी न कमी होगी न कोताही। और जो कुछ इस मुकद्दस जज्ये के साथ दीन व दुनिया का कोई काम करेगा तो चूँकि वह इफरात व तफरीत और हर किस्म की कोताहियों और ऐबों से पाक होगा। इसलिए ज़ाहिर है कि इसका फायदा यही होगा कि इस के हर काम में जीनत आराइश होगी। और उसके हर अमल में बेहतरीन सिंगार व सुधार पैदा हो जायेगा। जिसको हदीस में " फइन्नहु अज़यनु लिअमरिक कुल्लेहि' फरमाया गया है यानी तेरा हर अमल मुज़य्यिन हो जायेगा। यही वजह है कि कुरआने मजीद में बार बार " 
इत्तकुल्लाह' फ़रमाकर हक जल्ला मजदहु ने अपने बन्दों को तकवा और 'खुदा से डरने का हुक्म दिया है। और हदीस शरीफ में हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यहाँ तक इरशाद फरमाया " तकवा ही तमाम नेक कामों का दारो मदार है" अल्लाह तआला हम तमाम मुसलमानों को तकवा और खौफे खुदा की ला जवाल और बे मिसाल दौलत से मालामाल फरमाये। आमीन।

*(2)📗तिलावते कुरआन व ज़िक्रे इलाही :-* तिलावते कुरआन मजीद का अजरो संवाब कितना बुलन्द व बाला है इससे तकरीबन हर मुसलमान अच्छी तरह वाकिफ है इसके फवाइद व मुनाफ़ाअ  में से इस हदीस में हुजूर सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ख़ास तौर पर दो फायदों का ज़िक्र फरमाया है। एक फायदा तो यह है कि तिलावत और ज़िक्रे इलाही करने वालों का आसमानों में जिक्र व चर्चा होगा क्योंकि अह़ादीसे सह़ीहा में आया है कि जब कोई बन्दा ज़मीन पर कोई अमल करता है तो अल्लाह तआला अपने फरिश्तों में उसका ज़िक्र व चर्चा फरमाता है। और फ़रिश्तों को मुखातब करके इरशाद फरमाता है कि ऐ फ़रिश्तों! देख लो। रुऐ ज़मीन पर मेरा बन्दा तमाम दुनियावी लज्जतों और आसाइशों को ठुकरा कर मेरी रज़ा के लिए अमले सॉलेह में मशगूल हो गया है। मेरा कलाम पढ़ता है और मेरा जिक्र करता है। फिर फरिश्ते भी आपस में उस बन्दे का जिक्र करते हैं और उसकी मदह व सना करने लगते हैं। इसी तरह आसमानों में उस बन्दे के जिक्र का डंका बज जाता है ज़ाहिर है कि यह कितना बड़ा फायदा है?
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 92,93)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣3️⃣*

*❣️रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम* 

📔दूसरा फायदा यह कि तिलावते कुरआन मजीद और जिक्रे इलाही इसके लिए जमीन में नूर बन जाऐगा। इसका मतलब यह है कि उसकी आँखो में इन दोनों नेक अमलो की बदौलत एक ऐसा ईमानी नूर पैदा हो जायेगा कि रुऐ ज़मीन में बेशुमार छिपी हुई कुदरत की निशानियाँ उसकी निगाहों के सामने मुनव्वर और रौशन हो जायेंगी। और वह कायनात के ज़रें ज़रे में कुदरते खुदावन्दी और उसकी रबूबियत की तजल्लियों का नज़ारा करेगा। इस तरह वह बहुत जल्द वासिले इलल लाह हो जायेगा। यही वह मज़मून है जिसको इस हदीस में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इन लफज़ो के साथ इरशाद फरमाया  *तर्जुमा :-* तिलावत और ज़िक्रे इलाही से आसमान में तुम्हारा जिक्र होगा और ज़मीन में यह तुम्हारे लिए नूर बनेगा।

*3🗣️तवील ख़ामोशी :-* तीसरी वसीयत हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह फरमायी कि बातें कम करो और कुदरते खुदावन्दी और उसकी शाने रबूबियत में गौर व फिक्र करते हुए तफ़क्कुर व तदब्बुर के साथ देर तक खामोश रहा करो। इस अमल के बहुत से फवाइद में से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस हदीस में दो जलीलुल कद्र फ़ायदों का जिक्र फरमाया। पहला यह कि खामोशी शैतान को फटकारने वाली चीज़ है। जाहिर है कि जब आदमी ख़ामोश रहेगा और दीन की बातों में तफक्कुर व तदब्बुर करता रहेगा तो उसके मुँह से कोई गलत और नाजाइज बात नहीं निकलेगी और शैतान नाकाम व ना मुराद होकर भाग जायेगा। क्योंकि शौतान का यही काम है कि वह वसवसा डाल डाल कर इन्सान को नाजाइज़ बातें बोलने की तरगीब दिलाता रहता है। और जब कोई आदमी ख़ामोश रहेगा और उसकी ज़बान से कोई ला यअनी और लग्व *(बेकार)* बात नहीं निकलेगी तो शैतान अपने काम में नाकाम व ना मुराद होकर यकीनन वहाँ से भाग निकलेगा। और दूसरी यह कि जब आदमी अपने दीन में और दीन की बातों में गौर व फिक्र करने में।ख़ामोशी के साथ मशगूल रहेगा और दुनियावी बात चीत में मशगूल न रहेगा तो दीन और दीनी बातों के सोचने और समझने और उन पर अमल करने के मन्सूबे बनाने का खूब मौका मिलेगा। इस तरह खामोशी दीन के कामों के लिए बिला शुबा और यकीनन मददगार साबित होगी। इसी मज़मून को इस हदीस में इस तरह बयान फरमाया गया कि  *तर्जुमा :-* " तवील ख़ामोशी शैतान को बहुत ज़्यादा फटकारने वाली।चीज़ है और यह तुम्हारे दीनी कामों में तुम्हारे लिए मददगार भी होगी।"
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 93,94)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣4️⃣*

*💎रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वसल्लम* 

*(4)🗣️कम हँसना :-* ज़्यादा हँसने के दो नुकसान इस हदीस में हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बयान फरमाये हैं। एक यह कि ज्यादा हँसने से दिल मुर्दा हो जाता है और दूसरा यह कि चेहरे का नूर बरबाद व गारत हो जाता है जाहिर है कि हँसी की कसरत उसी वक्त होगी जब दिल खौफे इलाही और यादे खुदावन्दी से गाफिल हो। और यही दिल की मौत है और जब दिल में इबादतों की वजह से नूरानियत पैदा होती है तो चेहरे पर भी नूर का जुहूर होता है। यही वजह है कि नेक बन्दों के चेहरों पर एक खास किस्म की रौनक और एक तरह का नूरानी जमाल महसूस होता है और जब दिल मुर्दा और ये नूर हो जायेगा तो यकीनन बिला शुबाह चेहरे की नूरानी रौनक और नूरानियत बरबाद व गारत हो जायेगी इस लिए इस हदीस में इरशाद फरमाया गया कि
*तर्जुमा :-* ज़्यादा हँसना दिल को मुर्दा कर देता है और चेहरे के नूर को गारत कर देता है"

*(5)💫हक गोई :-* हर जगह हर मौका और हर मामला में अलानिया बात कह देना यह एक मोमिने कामिल का ऐसा तुर्रए इम्तियाज़ और इतना बुलन्द पाया ईमानी जौहर है कि एक हदीस में हुजूर सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि 

*तर्जुमा :-*"ज़ालिम बादशाह के सामने हक बात बोल देना जिहाद की अफजल व आला किस्म है चुनाँचे हजरत उमर फारुके आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु इस ख़सलत में बहुत मुमताज़ थे। तो मकामे मदह में उनके लिए " *अन्नातिकु बिलहक्क़के वस्सवाब" का मुअज्ज़िज़* ख़िताब दरबारे नुबुव्वत से अता किया गया। इसी लिए इस हदीस में पाँचवी नसीहत यह बयान की गई कि *कुलिल हक़्क़ा व इन काना मुर्रा"* यानी हक बात कह देनी चाहिये अगरचे वह तल्ख व कड़वी ही क्यों न हो।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 94,95)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣5️⃣*

*♻️रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम* 

*(6)🕋खुदा के मामले में किसी की परवाह न करना :-* इस वसीयत का मलतब यह है कि खुदा के अहकाम और दीने इस्लाम के हर पैगाम को पहुँचाने और वयान करने में कभी हरगिज़ कोई खौफ व हिरास और झिझक नहीं होनी चाहिये। न किसी के तअन व तशनीअ और किसी की लानतो मलामत की परवाह करनी चाहिये। हलाल को हलाल, और हराम को हराम, बुरे को बुरा,अच्छे को अच्छा, काफ़िर को काफिर, बद मज़हब को बद मज़हब, फ़ासिक को फ़ासिक, बिला तरद्दुद्  और बिला ख़ौफ़ व ख़तर कहना चाहिये। और इस मामले में हरगिज़ हरगिज़ किसी के बुरा भला कहने की परवाह नहीं करना चाहिये। इस हदीस में इरशादे नबवी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का यही मतलब है कि *ला तख़फ़ फ़िल्लाहि लौमत लाइमिन"* यानी अल्लाह अज्जवजल के मामले में किसी मलामत करने वाली की मलामत से मत डरो।

*(7)👤दूसरों के उयूब तलाश मत करो:-* इस वसीयत का मतलब यह है कि दूसरों के उयूब बयान करने से पहले यह सोचना ज़रुरी समझ लेना चाहिये कि वह उयूब खुद मेरी ज़ात में तो मौजूद नहीं है? अगर बिलफर्ज़ अपनी ज़ात में वह उयूब हों तो फिर हरगिज़ हरगिज़ यह जाइज़ नहीं कि दूसरों के उन ऐबों को ढूंढ ढूँढ कर उनका चर्चा करें और खुद अपने नफ़्स की इस्लाह कर लें फिर दूसरों के ऐबो पर इस्लाह की नियत से नज़र डालें।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 95,97)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣6️⃣*

*🌎दुनिया में लिबास आख़िरत में नंगी*

*💫हदीस :-* हज़रत उम्मे सलमा  रदियल्लाहु तआला अन्हा ने कहा कि एक रात नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बेदार हुए तो फ़रमाया कि सुब्हानल्लाह इस रात में कैसे कैसे फित्ने उतारे गये। और कैसे कैसे ख़ज़ाने खोले गये। इन हुजरे वालियों को (इबादत के लिए) जगाओ क्योंकि बहुत सी औरतें।दुनिया में लिबास पहने हुए हैं मगर वह आख़िरत में नंगी होंगी।

*♻️हज़रत उम्मे सलमा :-* इस हदीस को रिवायत करने वाली उम्मल मोमिनीन बीबी उम्मे सलमा रदियल्लाहु तआला अन्हा हैं इनका असली नाम नबीयता या रम़ला है और यह अबू उमय्या की साहिबज़ादी हैं। यह पहले हज़रत अबू सलमा रदियल्लाहु तआला अन्हु की बीवी थीं। हज़रत अबू सलमा उनको अपने बच्चे के साथ लेकर हिजरत के लिए रवाना होने लगे तो बीबी उम्मे सलमा को उनके मैके वालों ने रोक लिया और।बच्चे को हज़रत अबू सलमा के ख़ानदान वालों ने छीन लिया। मगर हज़रत अबू सलमा बीवी बच्चों को छोड़ कर मदीना मुनव्वरा चले गये। फिर कुछ दिनों बाद बीवी उम्मे सलमा भी अपने बच्चे को हमराह लेकर अकेली हिजरत करके मक्का मुकर्रमा से मदीना मुनव्वरा रवाना हो गईं। हजरत उम्मे सलमा रदियल्लाहु तआला अन्हु जब तीन हिजरी या चार।हिजरी में वफात पा गये तो हुजूरे।अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बीबी उम्मे सलमा से निकाह फ़रमा कर उनको उम्माहाते मोमिनीन *(मोमिनों की माएँ)* में शामिल कर लिया। तीन सौ अटहत्तर हदीसें उन्होनें हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से।रिवायत की हैं। 59 हिजरी में चौरासी साल।की उम्र पाकर मदीना मुनव्वरा में वफात पायी और जन्नतुल बकी में मदफ़्न हुई। बहुत से सहाबा व।ताबीन आपके शागिर्दो में हैं।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 96,97)*
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*❣️दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣7️⃣*

*🌎दुनिया में लिबास आख़िरत में नगी*

*(1)📝शरहे हदीस :-* इस हदीस के बारे में मुन्दरजा ज़ैल बातें याद रखने के काबिल हैं। इस हदीस को हज़रत इमाम बुख़ारी अलैहिर्रहमा ने इसके अलावा मुन्दरजा ज़ैल अबवाब में ज़िक्र किया है सलातुल लैल, अलामातुल नुबुव्वत,किताबुल अदब, किताबुल लिबास, किताबुल फितन और हज़रत इमाम तिरमिजी ने इस हदीस को सिर्फ किताबुल फ़ितन में दर्ज किया है खुदावन्द आलम जल्ला जलालुहू हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को आइन्दा होने वाले फ़ितनों और फुतूहात के ख़ज़ानों का ख्वाब में या बेदारी में मुशाहिदा करा दिया और आपने उनकी कसरत को देखकर तअज्जुब का इज़हार फरमाते हुए यह इरशाद फरमाया।सुब्हानल्लाह आज की रात में किस।क़दर ज़्यादा फितने और ख़ज़ाने आसमान से ज़मीन पर उतारे गये हैं। बुख़ारी शरीफ की एक दूसरी रिवायत में यूँ भी आया है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह इरशाद फरमाया कि मैं तुम्हारे घरों में फित्नों को इस तरह गिरते हुए देख रहा हूँ जिस तरह बारिश के कतरात मुसलसल और लगातार ज़मीन पर गिरते हैं'

*(2)*🔥बुखारी शरीफ के हवाशी में है कि फ़ितनों से मुराद " अज़ाब" और।ख़ज़ानों से मुराद “ रहमतें' हैं। और बाज़ शारेहीने हदीस ने फरमाया कि।फ़ितनों से मुराद आइन्दा होने वाले फ़सादात और लड़ाईयाँ हैं जो इस उम्मत के लिए बाइसे फितना हैं। जैसे अमीरुल मोमिनीन हज़रत उस्मान गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत, जंग जमल, जंग सिफ्फीन, जंग हुर्रा जंगे कर्बला, वगैरह जिनसे बहुत ज्यादा फितने फैले और मुसलमानों का बेहद जानी व माली नुकसान हुआ।

*(3)*💎और खजानों से मुराद वह फुतूहात हैं जो खुल्फाऐ राशिदीन और उनके बाद आने वाले मुस्लिम सलातीन को हासिल हुई कि फारस व रोम बल्कि यूरोप व एशिया के खजाने मफतूह होकर इस्लामी बैतुल माल में आ गये।

*(4)*🕌 इसके बाद हुजूर नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हुजरे वालियों यानी अपनी अज़वाजे मुताहरात को जगाने का हुक्म फ़रमाया कि वह उठ कर नमाज़े तहज्जुद पढ़े। आप का यह मुबारक तरीका था कि जब कोई खौफ नाक मन्ज़र देखते थे तो फौरन नमाज में मशगूल हो जाते थे। और दूसरों को भी उसका हुक्म फरमाते।थे। चूंकि उस वक्त अज़वाजे।मुताहरात ही नज़रों के सामने थीं इस लिए आपने उनको जगाने का हुक्म दिया था ताकि खुद भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इबादत में मसरुर हो जाएं और उम्मत की माँए भी खुदा की इबादत में लग जाएं।

*(5)*💫 हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी मुकद्दस बीवियाँ को जगाने का हुक्म फरमाया और उस का सबब यह बताया कि बहुत सी औरतें जो इस दुनिया में किस्म किस्म के लिबासों और पोशाको में मुलव्विस नज़र आती हैं कयामत के दिन बिल्कुल नंगी रहेंगी क्योंकि आख़िरत में लिबास और जन्नत की पोशाक मिलने का दारोमदार नेक आमाल ही पर है तो जिन औरतों ने दुनिया में नेकियों का जखीरा नहीं जमा किया और अच्छे आमाल से खाली हाथ आख़िरत में गई तो भला आख़िरत में इन्हें कहाँ से लिबास मिलेगा? इसलिए वह दुनिया में तो अगरचे तरह तरह के लिबासों में मुलव्विस रहीं हैं मगर आख़िरत में बिल्कुल नंगी रहेंगी इस लिए हुजूर सल्लल्लाहुं तआला अलैहि वसल्लम ने इस हदीस में खुसूसी तौर पर अपनी बीवियों और दूसरी औरतों को आमाले सालेहा की तरगीब दी ताकि वह दुनियां में इबादत करके आख़िरत के लिबास का समान करले 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 97,98)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 6️⃣8️⃣*

*🌎दुनिया में लिबास आख़िरत में नगी*

*💎मसाइले हदीस:-* इस हदीस से मुन्दरजा जैल मसाइल पर रौशनी पड़ती है रात को अपने अहल व अयाल को इबादत के लिए जगाना मुस्तहब है खुसूसन ऐसी सूरत में जब कि किसी अहम वाकिआ का जुहूर. हुआ हो तअज्जुब के मौका पर सुब्हानल्लाह कहना हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सुन्नत हैं रात में भी नेकियो का हुक्म देना, और बुराईयों से मना करना, और लोगों को भी मसाइले दीन बताना जाइज़ है। ख़ास कर अपने अहल व अयाल को नसीहत करना और उनको तरगीब व तरहीब सुनाना भी मसनून तरीका है। फकत औरतों ही को बाज़ सुनाना जाइज़ है। अगर किसी शख़्स को किसी फितना या खुशख़बरी की इत्तिला हो जाए तो लोगों को उस से आगाह कर देना जाइज़ है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 98,99)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣0️⃣*

*🩸ख़ूने नाहक़ की मुमानअत*

*📝फवाइदे मसाइल :-* 
*(1)* इस हदीस को इमाम बुखारी ने "मुगाजी' और ' दियात' में भी जिक्र फ़रमाया है और इमाम मुस्लिम ने किताबुल ईमान में और निसाई ने किताबुल इल्म में और इब्ने माजा ने किताबुल फ़ितन में तहरीर फरमाया है।मुसलमान के कत्ल को हलाल समझ कर किसी मुसलमान का कुफ्र है और

*(2)* मुसलमान के कत्ल को हराम जानते और मानते हुए किसी मुसलमान को कत्ल कर देना गुनाहे कबीरह है। जिस पर कुरआन मजीद में अज़ाबे शदीद की वईद आयी है।

*(3)* आलिमों की तकरीर के लिए बात चीत करने वाले मजमअ को ख़ामोश कराना जाइज़ है।

*(4)* वअज व तकरीर के वक्त हाज़ेरीने मजलिस को ख़ामोश होकर सुकून व इत्मीनान के साथ वझूज़ व तकरीर सुनना लाज़िम है और हर खुत्बा का सुनना वाजिब है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 100,101)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣1️⃣*

*❣️दिल की सख़्ती का इलाज*

*📝हदीस :-* हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु से मन्कूल है कि एक शख्स ने नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में अपने दिल की सख्ती की शिकायत की तो आपने फ़रमाया कि तुम यतीम के सर पर हाथ फैलाओ और मिस्कीन को खाना खिलाओ।

*❤️शरहे हदीस :*- "कस्वतुन" के माना दिल की सख्ती के हैं। दिल की सख्ती एक रुहानी बीमारी है। जब दिल में सख्ती पैदा हो जाती है तो दिल से रहम व शफकत का जज़्बा ख़त्म हो जाता है। और आदमी बिल्कुल बे रहम हो जाता है। और जब इन्सान का दिल रहम व मेहरबानी के जज़्बे से खाली हो जाता है तो आदमी बिल्कुल ही बद खुल्क बल्कि इन्तिहाई जालिम व खून खुवार दरिन्दों के मिस्ल हो जाता है। उसको न किसी पर रहम आता है न वह किसी के साथ मेहरबानी शफकत करता है न किसी पर उसको प्यार आता है। न वह किसी से मुहब्बत व मुरव्वत का बरताव करता है बल्कि हर वक्त जुल्म व सितम पर कमर बस्ता रहता है। यहाँ तक कि लोगों पर जुल्म व सितम ढाने में उसको खास किस्म की लज्जत महसूस होती है। और इन्सानों और जानवरो के दुख दर्द और उनकी मुसीबतों को देखकर उसको मुसर्रत व खुशी होती है।

✨अब ज़ाहिर है कि " कस्वतुन" यानी सख्त दिली कितनी ख़तरनाक और किस कदर मोहलिक बीमारी है। कि इसकी नहूसत से इन्सान हुस्ने अख्लाक मुहब्बत व मुरव्वत सिला रहमी नेक सुलूक करीमाना बरताव रहम व शफकत वगैरह सैकड़ों बेहतरीन ख़सलतों के महासिन व फ़जाइल से महरुम हो जाता है और तमाम इन्सानों बल्कि जानवरो तक की निगाहों में मरदूद व मगजूब और काबिले नफ़रत बन जाता है। और खुदावन्द कुद्दूस के दरबार में ज़ालिम व जाबिर और जफा कार सितम पेशा करार पाकर क़ाबिले लानत बन जाता है 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 101,102)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣2️⃣*

*❤️दिल की सख़्ती का इलाज* 

💫और दुनिया व आखिरत की तमाम भलाईयों से महरुम होकर गुनाहों का मुजस्समा और पाप का।पुतला बना जाता है। और वह इसके सिवा और किसी लायक नहीं रहता कि उस पर मख़लूके ख़ुदा की लानतों और नफरतों की बेशुमार फटकार पड़ती रहे। और कहरे इलाही की बिजलियाँ उसके ख़िरमने वजूद को सोख्त करके उसको तहस नहस।करती रहें। और वह दुनिया व आख़िरत में ज़लील व ख्वार होकर हिरमान व ख़सरान के ऐसे अमीक गार में गिर पड़े जहाँ सलाह व फलाह की रौशनी भी न पहुँच सकती हो। इसी लिए सहाबा किराम में से एक खैर पसन्द शख्स ने जो इस कस्वतुन *(सख्त दिली)* की बीमारी में गिरफ्तार था। दोनों आलम के हकीम रसूले करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाहे शिफा में हाज़िर होकर इस बीमारी का इलाज पूछा और अपनी सख्त दिली की शिकायत अर्ज की। तो हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस बीमारी के यह दो इलाज बताए कि  *(1)* तुम यतीम के सर पर हाथ फिराओ। *(2)* मिस्कीन को खाना खिलाओ तो तुम्हारी सख्त दिली की बीमारी दूर हो जायेगी।

*🔮मर्ज व इलाज में मुमानअत :-* अब यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि यतीम के सर पर हाथ फिराने से और मिस्कीन को खाना खिलाने से इन्सानों के दिल की सख्ती क्यों कर और कैसे दूर हो जाएगी।? आख़िर इन दोनों कामों को दिल की सख्ती से क्या तअल्लुक है? तो इसका जवाब यह है कि यह दुनिया आलमे अस्बाब है और इसकी दुनिया की हर चीज़ में एक ख़ास तासीर है। और हर चीज़ की तासीरात दूसरी चीज़ों में असर अन्दाज़ होती है और हर चीज़ किसी न किसी चीज़ का सबब बनती है। क्योंकि खल्लाके आलम ने एक चीज़ को दूसरी चीज़ का सबब बना दिया है। और एक चीज़ की तासीर से दूसरी चीज़ आलमे वजूद में आ जाया करती है। मसलन किसी को खट्टा लीमू खाते देखकर सबके मुँह में पानी आ जाता है। प्याज़ काटने से सब की आँखो में आँसू आ जाता है। किसी आशोबे चश्म वाले की आँखों की सुर्खी कोदेखकर सब की आँखों में सुर्खी आ जाती है। किसी को मुक्का दिखाने से वह गज़बनाक हो जाता है।
*पोस्ट जारी,,,*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 102,103)*
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣3️⃣*

*💝 दिल की सख़्ती का इलाज*

⭐ किसी के आगे हाथ जोड़ने से वह रहम दिल हो जाता है। यह सब कुछ क्यों और कैसे होता है इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है कि यह सब असबाब व मुसब्बात की कार फरमाईयाँ हैं। और यह सब मुखतलिफ चीज़ों की मुखतलिफ तासीरात हैं। जो एक दूसरी चीज़ो में असर अन्दाज हुआ करती हैं। और यह सब असबाब व मुसब्बात और तासीरात व असरात खुदा के पैदा किये हुए हैं। जिनकी इल्लतों और हिकमतों को बन्दा कमा हक़्क़हु नहीं समझ सकता। बस यही हाल यहाँ भी है कि यतीम के सर पर हाथ फिराने और मिस्कीन को खाना खिलाने की यह तासीर है कि इन्सान के कल्ब में नरमी पैदा होकर उसके दिल की सख्ती की बीमारी दूर हो जाती है। या यूँ कह लो कि यतीम के सर पर हाथ फिराना और मिस्कीन को खाना खिलाना यह दिल का नरम करने और कल्ब की सख्ती दूर करने का सबब है कि जब यतीम के सर पर हाथ फिराओगे और मिस्कीन को खाना खिलाओगे तो दिल जरुर नरम होगा। और सख्त दिली दूर हो जायेगी। इस लिए यतीम के सर पर हाथ फिराना और मिस्कीन को खाना खिलाना सख्त दिली की बीमारी का शाफी इलाज है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 103,104)*
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*📝दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣4️⃣*

*👤सर पर हाथ फिराने से क्या मुराद है❓*

🔮 याद रखो कि सर पर हाथ फिराने और मिस्कीन को खाना खिलाने से मुराद इन दोनों हर मामला में रहम व शफकत करना है। वरना जाहिर है कि अगर कोई यतीम के सर जूता भी मारता रहे और हाथ भी फिराता रहे इसी तरह मिस्कीन का गला भी घोंटता रहे और खाना भी खिलाता रहे। तो उससे हरगिज हरगिज़ उसके दिल की सख्ती दूर नहीं हो सकती तो इरशादे नबवी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मतलब है कि यतीम के सर पर हाथ फिराये जो रहम व शफकत का एक निशान है 

💎 और मिस्कीन को खाना खिलाऐ जो हुस्ने सुलूक और रहीमाना बरताव की एक अलामत है खुलासा कलाम यह है कि यतीम के सर पर हाथ फिराये और मिस्कीन को खाना खिलाए यानी हमेशा यतीम और मिस्कीन पर मुहब्बत व शफ़क़त करता रहे और इन दोनों के साथ इन्तेहाई मुशफिकाना करीमाना सुलूक व बरताव करे तो इसका यह असर होगा कि उसके दिल की सख्ती का मर्ज़ हो जाएगा और रहमदिली पैदा हो जाऐगी।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 103,104)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣5️⃣*

*❣️दिल की सख़्ती का इलाज*

*👤यतीम के साथ हुस्ने सुलूक :-* यतीम के साथ अच्छा बरताव और मुशिफ़ाकाना सुलूक करने की बहुत बड़ी फजीलत है। 

*📖एक हदीस शरीफ में है कि :-* मुसलमानों में सब से अच्छा और बेहतरीन वह घर है जिस घर में कोई यतीम हो। और उसके साथ बेहतरीन सूलूक किया जाता हो। और मुसलमानों के घरों में सब से बुरा और बदतरीन वह घर है कि जिसमे कोई यतीम हो और उसके साथ बदतरीन बरताव किया जाता हो। इसी तरह हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यतीमों के बारे में इरशाद फरमाते हुए यूँ फरमाया कि :किसी यतीम बच्ची या बच्चे के साथ अच्छा सुलूक करने वाला जन्नत में मेरे साथ रहेगा।" 

*💫मिस्कीनों के साथ नेक बरतावः-* मिस्कीनों के साथ अच्छा बरताव उन को खाना खिलाने और कपड़ा पहनाने का कितना बड़ा अज्र और कितना अजीम स़वाब है इस सिलसिले में भी एक.  हदीस पढ़ लो।

"💎हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स किसी नंगे को कपड़ा पहनाऐगा तो अल्लाह तआला उसको बहश्त का सब्ज़ लिबास पहनाएगा। और जो किसी भूके मुसलमान को खाना खिलाएगा तो अल्लाह तआला उसको जन्नत के मेवे खिलाएगा। और जो कोई किसी प्यासे मुसलमान को सैराब कर देगा तो अल्लाह तआला उसको जन्नत का वह शर्बत पिलाऐगा जिस पर मुहर लगी होगी 

*▶️पोस्ट ज़ारी*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 104,105)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣6️⃣*

*❤️दिल की सख़्ती का इलाज*

🔮बहर हाल मिल्लते इस्लामिया के यतीमों और मिस्कीनों के मुशफ़िकाना सुलूक और करीमाना बरताव। यह दिल की सख्ती का एक शाफी इलाज होने के साथ साथ बेहतरीन अमले सॉलेह भी है। यही वजह है कि कुरआन मजीद और हदीसों में यतीमों और मिस्कीनों के साथ अच्छा सुलूक करने की बहुत ज्यादा ताकीद आयी है। कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को खास तौर पर फरमाया कि " फ़अम्म़ल यतीमा फ़ला तक़हर" यानी यतीम को किसी तरह मत दबाओ और मुसलमानों को भी मुखातिब करके इरशाद फरमाया कि “ इन्नल लज़ीना याकुलूना अम्व़ालल यत़ामा। इन्नमा याकुलूना फ़ी बूतूनेहिम नारा" यानी जो लोग यतीमों का माल खा डालते हैं वह दर हकीकत अपने पेटों में आग खा रहे हैं दूसरी जगह यतीमों के साथ बदसुलूकी करने वालों के बारे में मज़म्मत करते हुए कुरआन ने ऐलान फरमाया कि " फज़ालिकल लज़ी यदुअउल़ यतीमा वला यहुददो अला तआमिल मिस्कीन" यानी जो शख्स यतीमों को धक्का दे और यतीमों को खाना खिलाने की रग़बत न दिलाए वह उन लोगों के तरीको पर है जो कयामत के मुन्किर हैं। यानी यतीमों को धक्का देना और मिस्कीनों को खाना खिलाने की तरगीब न देना यह मुसलमान का तरीका नहीं है बल्कि काफिरों का तरीक़ा है

✨खुलासए कलाम यह है कि हर मुसलमान मर्द औरत पर लाज़िम है कि मिल्लते इस्लामिया के यतीमों और मिस्कीनों पर हमेशा नज़रे रहमत रखे और निहायत शफकत व मुहब्बत के साथ उन लोगों से अच्छे से बरताव करे। काश दौरे हाज़िर के मुसलमान इस इरशादे नबवी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपना नमूनए अमल बना कर इस्लामी मुआशरा में बेहतरीन इन्किलाब पैदा करते। ताकि तालीमात नुबुब्बत से अक़वामे आलम को मुतअस्सिर करके उनको दामने इस्लाम में लाकर इस्लाम का बोल बाला करें।

*▶️पोस्ट ज़ारी*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 104,105)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣7️⃣*

*👤तन्दरुस्ती में सदक़ा करने की फ़ज़ीलत*

*📖हदीस :-* हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि एक शख्स ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! कौन सा सदका अफज़ल है ? तो आप ने फरमाया कि जब तू तन्दरुस्ती में माल की ख्वाहिश होते हुए मोहताजगी का ख़ौफ और माल दारी की तअम रखते हुए सदका करे *(तो यह अफज़ल सदका है)* और इतनी देर मत कर कि जान हलकूम तक आ पहुँचे उस वक्त तू कहे कि फलाँ को इतना माल और फलाँ को इतना माल दिया और हाल यह है कि अब वह माल *(फलाँ)*  का हो चुका। 

*📝शरहे हदीस :-* हदीस का म़फ़हूम यह है कि अगरचे खुलूसे नियत के साथ सदका किया तो हर वक्त और हर हालत में बहर सूरत बाइसे अजरो सवाब है मगर ऐसे वक्त में जब कि आदमी तन्दुरुस्त होता है और हुसूले दौलत की कोशिश करता है। और माल जमा करने की. हिर्स अपने शबाब पर होती है और उसको यह भी डर लगा रहता है कि मैं कहीं मोहताज न हो जाऊँ। और माल व दौलत की ज़रुरतें भी उसके सामने होती हैं मगर इन सब के बावजूद सदका करना यह बहुत ही अफजल और बहुत ही अजरो सवाब का मोजिब है। क्योंकि माल की हिर्स उसको सदका देने से रोकती है और वह उस हिर्स पर गल्बा हासिल करके सदका देता है। तो गोया नफ्स से जिहाद करते हुऐ सदका देता है इस लिए लाज़मी तौर पर उसका अज़रो सवाब बढ़ जाता है और सरमाया परस्त बलीलों की यह कैफियत होती है कि उम्र भर तो वह कन्जूसी में मुन्तला रहते हैं और किसी को कुछ नहीं देते और जब मौत के आसार नमूदार होते हैं और जान निकलने लगती है और माल की कोई ख्वाहिश बाकी नहीं रहती है तो कहने लगते हैं कि मैने फलाँ को इतना माल दिया। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते है कि मुसलमानों की यह कैफियत नहीं होनी चाहिये। बल्कि मुसलमानों को चाहिये कि तन्दरुस्ती की हालत में जब कि माल की ख्वाहिश और हिर्स अपने शबाब पर होती है उस वक्त सदका देना बेहतर और अफजल है।
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 105,106)*
➡️पोस्ट जारी है....
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣8️⃣*

*💎ईसाले सवाब*

*📖हदीस :-* हज़रत सद बिन उबादा से रिवायत है उन्होंने कहा कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! बेशक सअद की माँ की वफ़ात हो गई तो *(उनके ईसाले सवाब के लिए)* कौन सा सदका अफज़ल है? तो आपने फरमाया कि पानी । तो उन्होंने एक कुआँ खोदा और कह दिया कि यह कुआँ सअद की माँ को सवाब पहुँचाने के लिए है।


*📝हज़रत सअद बिन उबादा :-* इस हदीस के रावी सअद बिन उबादा रदियल्लाहु तआला अन्हु हैं उन की कुन्नियत अबू सालिस है। यह कबीला खज़रज की शाख़ बनू सअदा से तअल्लुक रखते थे यह कबीला अन्सार के सरदार और उनके रईस'थे। और अन्सार के बारह नकीबों में से एक बहुत ही वजीह नकीब थे। यह हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफ़ात के बाद मुल्क शाम चले गये थे। और इस जमाअंत ने इन से हदीसों की रिवायत की है कि उनकी वफ़ात का वाकिआ यह है कि यह गुस्ल ख़ाने में मुरदा पाये गये। और इनका सारा बदन सब्ज़ रंग का हो गया था। किसी को इनकी वफ़ात का सबब मालूम नहीं हुआ। हाँ अल्बत्ता लोगों ने सुना कि कोई यह शेर पढ़ रहा है।
نحن قتلنا سيد الخزرج سعد بن عبادة
ورمينا يسهمين فلم نخط فوادة
"
'यानी ख़ज़रज के सरदार सअद बिन उबादा को हम लोगों ने कत्ल किया है और हम लोगों ने दो तीरों से मारा तो हम लोगों से उनके दिल को निशाना बनाने में ख़ता नहीं हुई।"
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 105,106)*
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➡️पोस्ट जारी है....

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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 7️⃣9️⃣*

      *🔮इसाले सबाब*

💫लोगों ने इस शेर पढ़ने वाले की आवाज़ को सुना लेकिन आस पास में किसी को नहीं देखा तो आम तौर पर लोग कहने लगे कि जिनों की जमाअत ने हज़रत सअद का तन्हाई के आलम में गुस्ल खाने में कत्ल कर दिया। यह वाकिआ 15 हिजरी खिलाफते फारुकी के दौर में हुआ। और बाज़।का कौल है कि हजरत अबू बक्र सिद्दीक रदियल्लाहु तआला।अन्हु की खिलाफत के दौरान 11 हिजरी में हुआ। वल्लाहु तआला अअलम।

*📝तबसरा :-* हज़रत सअद बिन उबादा रदियल्लाहु तआला अन्हु की वालिदा जिनका इन्तिकाल हुआ था उनका नाम अम्रो था। हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने उनके ईसाले सवाब के लिए पानी का सदका तजवीज़ फ़रमाया। तो हज़रत सअद बिन उवादा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने एक कुआँ खुदवाकर उसका सवाब अपनी वालिदा की रुह को पहुंचा दिया। इस हदीस. से साबित हुआ कि मुसलमान अपने किसी नेक अमल का।सवाब अगर किसी मय्यत।की रुह को पहुँचा दे तो यह जाइज़ व दुरुस्त और बाइसे सवाब है। कु.रआन मजीद की तिलावत या दुरुद शरीफ़ या कलिमा तय्यबा गर्ज़ कोई अमले खैर हो ख़ाह इबादते मालिया हो या इबादते बदनिया हो ख़्वाह फर्ज हो या नफल हो सब का सवाब ज़िन्दों या मुर्दो को पहुँचाया जा सकता है। और ज़िन्दों के ईसाले सवाब से मुर्दो को बिला शुबा यकीनन नफा पहुंचता है। लिहाज़ इस ईसाले सवाब और फातिहा को जो लोग बिदअत कह कर हराम बताते हैं यकीनन वह लोग गुमराह और दीनी मसाइल से जाहिल हैं सुन्नी मुसलमानों को इन गुमराहों की बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देना चाहिये। बल्कि ईसाले सवाब और फ़ातिहा को एक अमले ख़ैर  समझ कर हमेशा करते रहना चाहिये।

💎हज़रत अनस रदियल्लाहु तआला 
 अन्हु फ़रमाते हैं कि हुजूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम की ख़िदमत में अर्ज किया कि हम अपने मुर्दो के लिए दुआ करते हैं और उनकी तरफ से सदका व हज करते हैं तो क्या इन चीजों का सवाब हमारे मुर्दो।को पहुँचता है ? तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जवाब।दिया कि “ बेशक मुर्दो को इसका सवाब पहुँचता है और वह इस तरह खुश होते हैं जैसे तुमको हदया दिया जाता है तो तुम खुश होते हो।

*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 107,108)*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 8️⃣0️⃣*

*🕋इस्लाम में सबसे पहली मुस्लिम शुमारी*

*📝हदीस :-* हिजरत के इब्तिदाई सालों में हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु।तआला अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों की तादाद मालूम करने के लिए उनकी गिनती करने का हुक्म दिया चुनाँचे मुस्लिम शरीफ की हदीस है कि हजरत हुजैफा रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है उन्होंने कहा कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास थे तो आप ने फरमाया कि तुम लोग मेरे लिए गिन्ती करो कि कितने लोग कलिमए इसलाम पढ़ते हैं? हज़रत हुजैफा ने कहा कि फिर हम लोगों ने *(गिन्ती करके)* अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम क्या आप हमारे बारे में खौफ रखते हैं? हालाँकि हम लोग छः सौ से सात सौ के दरमियान हैं। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया तुम लोग जानते नहीं। शायद तुम लोग किसी आज़माइश में डाल दिये जाओ। हज़रत हुज़ैफा ने कहा कि हम लोग इस तरह बला में डाल दिये गये कि हम में से कुछ लोग छुप कर ही नमाज़ पढ़ते थे।
 *(📚मुस्लिम जिल्द 1, पेज 84)*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 108,109)*
➡️जारी है.....
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 8️⃣1️⃣*

*💎इस्लाम में सबसे पहली मुस्लिम शुमारी*

*🔮हजरत हुज़ैफा रदियल्लाहु तआला अन्हु :-* इस हदीस के रावी हज़रत हुज़ैफा बिन यमान रदियल्लाहु तआला अन्हुमा हैं उनकी कुन्नियत अबू अब्दुल्लाह हैं और इनकी वालिदा कबीला औस के ख़ानदान की एक अन्सारिया औरत हैं जिनका नाम रुबाब बिन्ते कअब  है। हजरत हुज़ैफा का शुमार बुजुर्ग और बड़े सहाबा में है खुद यह और इनके वालिद यमान दोनों जंगे ओहद में शरीक हुए और उनके वालिद इसी जंग में शहीद हो गये। सहाबा किराम में यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के राजदार के लकब से मशहूर थे। और हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु इन्ही से मुनाफ़िकों का नाम व पता पूछा करते थे। और जिस जनाजे में हज़रत हुज़ैफा शरीक होते थे उसी जनाजे पर हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु भी नमाज़े जनाज़ा पढ़ते थे क्योंकि हज़रत उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु को यकीन था कि जिसकी नमाजे जनाज़ा हजरत हुज़ैफा पढ़ेगें वह यकीनन मुनाफ़िक नहीं होगा। इसलिए कि उनको हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने तमाम मुनाफिकों की फेहरिस्त बता दी थी।

⚔️हज़रत हुज़ैफा जंगे निहावन्द में भी शरीक थे। जब इस जंग के कमान्डर हज़रत नोमान बिन मकरिन शहीद हो गये तो हज़रत हुज़ैफा ही ने इस्लामी झण्डे को अपने हाथों में लिया और शहर हमदान और ईरान और दैनूर इन्हीं के हाथों पर फतह हुए। 36 हिजरी में इनकी वफात हुई और इनकी कब्र शरीफ मदाइन में हैं।
 *(📚इस्तिआब जिल्द 1 सफा234)*
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 108,109)*
➡️जारी है.....
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 8️⃣2️⃣*

*💎इस्लाम में सबसे पहली मुस्लिम शुमारी*

*📝शरहे हदीस :-* इस हदीस का खुलासा मतलब यह है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुसलमानों की गिनती कराई तो हज़रत हुज़ैफा का बयान है कि उस वक़्त मुसलमानों की तादाद छ: सौ और सात सौ कि दरमियान थी। सहाबा किराम ने बारगाहे नुबुव्वत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में अर्ज की कि या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! अब जबकि हम मुसलमानों की तादाद छ: सौ से सात सौ के दरमियान हो चुकी है तो क्या हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हम मुसलमानों के बारे में कोई खौफ व अन्देशा है कि कोई ताकत हम मुसलमानों को फना कर देगी? या हमारे मिशन को नाकाम बना देगी? यह सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि तुम लोग इस बात को नहीं जानते। हो सकता है कि तुम लोग किसी मुसीबत में मुन्तला कर दिये जाओ। तो उस वक्त तुम लोग इतनी तादाद होने के बावुजूद भी तुम लोग कुछ भी न कर सकोगे । हज़रत हुज़ैफा रदियल्लाहु तआला अन्हु का बयान है कि वाकई हम लोग इस के बाद ऐसी मुसीबतों में मुब्तला कर दिये गये कि हम लोगो में कुछ लोग ऐलानियाँ जमाअत के साथ नमाज़ नहीं पढ़ सकते थे। बल्कि छुप छुप कर घरों मे नमाज़ पढ़ा करते थे। क्योंकि घर से बाहर निकलने में फ़ितनों का हुजूम और लड़ाईयों की आग में पड़ जाने का शदीद ख़तरा था।

💫हज़रत हुज़ैफा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने जिन मुसीबतों में मुन्तला होने का ज़िक्र फरमाया है इनसे मुराद वह फितने हैं जो हज़रत अमीरुल. मोमिनींन उस्मान गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत के बाद इस तरह नमूदार हुए.कि बसरा में एक जंगे जमल और मैदाने सिफ्फीन में ऐसी रेज लड़ाईयाँ हुई कि हज़ारों सहाबा और ताबीन शहीद हो गये। और इन लड़ाईयों और फितनों की शोरिस इस कदर शिद्दत के साथ तमाम मुस्लिम आबादियों  में फैल गई कि कोई घर इन फित्नों की ज़द से महफूज न रह सका । और इस ज़र्ब व हरब और फितनों के हुजूम और हंगामों की वजह से बरसों तक इस्लामी फूतूहात की तरक्कियाँ मफलूज व मसदूद होकर रह गई।

*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 109,110)*
➡️जारी है.....
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*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
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*📜दर्से जवाहिरुल हदीस*
            *पोस्ट नम्बर:: 8️⃣3️⃣*

*🔮इस्लाम में सबसे पहली मुस्लिम शुमारी*

*💎तआरुज़ व तवाफुक :-* मुस्लिम शरीफ की मजकूरा बाला हदीस से मालूम हुआ कि मुस्लिम शुमारी में मुसलमानों की तादाद छ: सौ से सात सौ के दरमियान थी। लेकिन बुख़ारी शरीफ़ की एक रिवायत में है कि इस मुस्लिम शुमारी में मुसलमानों की तादाद एक हजार पाँच सौ थी। जाहिर है कि बुख़ारी व मुस्लिम की दोनों हदीसों के दरमियान काफी तआरुज़ है। कहाँ छः सौ से सात सौ के दरमियान और कहाँ डेढ़ हज़ार की तादाद । और बुख़ारी शरीफ ही की एक दूसरी रिवायत से पता चलता है कि सिर्फ पाँच सौ ही की तादाद थी। इस तरह खुद बुख़ारी शरीफ की इन दोनों रिवायतों में भी खुला हुआल तआरुज है।

💫बहरहाल इन रिवायात में तत्बीक की सूरत बयान की गई है कि मुस्लिम शरीफ की रिवायत में जो तादाद छ: सौ से सात सौ के दरमियान है यह तादाद सिर्फ शहरे मदीना के मुसलमानों की है और बुख़ारी शरीफ की रिवायत में जो डेढ़ हज़ार की तादाद है वह तमाम मुसलमानो की तादाद है जो मदीना मुनव्वरा और मक्का मुअज्जमा के तमाम मौज़िआत और कबाइल में आबाद थे। और बुख़ारी शरीफ की जिस रिवायत में पाँचससौ की तादाद मजकूर है उससे मुराद जंग के काबिल और फौजी सलाहियत रखने वाले मुसलमानों की तादाद है। इस तरह तीनों रिवायतों का तआरुज़ ख़त्म हो जाता है ।। 
*(📚जवाहिरूल हदीस सफहा, 110,111)*
➡️पोस्ट जारी है.....
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