हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कि जिन्दगी मुबारका

*🇮🇳"सिराते मुस्तक़ीम*
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*💎हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कि जिन्दगी मुबारका*
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*🏕️खानदानी हालात नसब नामा*

💫हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नसब शरीफ वालिद माजिद की तरफ से यह है हज़रत मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्दे मुनाफ़ बिन कुस्सई बिन किलाब बिन मुर्रह बिन कअब बिन लुवइ बिन गालिब बिन फ़हर बिन मालिक बिन नज़र बिन किनाना बिन ख्नुजेमा बिन मुदरिका बिन इल्यास बिन मुज़र बिन नज़ार बिन मअद्द बिन अदनान । 

💍वालिदा माजिदा की तरफ़ से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का शजरा ए नसब यह है हज़रत मुहम्मद बिन आमिना बिन्ते वहब- बिन अब्दे मुनाफ बिन जुहरा बिन किलाब- बिन मुर्रह  हुजूर के माँ बाप का नसबनामा किलाब बिन मुर्रह पर मिल जाता है । आगे चल कर दोनों का सिलसिला एक हो जाता है अदनान तक आपका नसबनामा सही तरीकों के साथ तमाम तारीख लिखने वालों से साबित है इसके बाद नामों में बहुत कुछ इख़्तिलाफ़ है हुजूर जब भी अपना नसबनामा बयान फ़रमाते थे तो अदनान ही तक ज़िक्र फ़रमाते थे 

✨मगर इस पर तमाम मुअरिंखीन का इत्तिफ़ाक है कि अदनान हज़रते इस्माईला की औलाद में से हैं हज़रते इस्माईल हज़रते इब्राहीम खलीलुल्लाह के बेटे अरजुमन्द हैं 
*(📚 बुखारी जिल्द -१ बाब मवअसुन - नबी )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,35)*
*➡️जारी है...*
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*⛺खानदानी शराफत*

🥀हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ख़ानदान व नसब बुलन्दी और शराफत में तमाम दुनिया के तमाम ख़ानदानों से बुलन्द व बाला है यह वह हकीकत है कि आपके बदतरीन दुश्मन कुफ्फारे मक्का भी कभी इसका इन्कार न कर सके चुनान्चे हज़रत अबू सुफियान जब वह कुफ़्र ही की हालत में थे बादशाहे रोम हरकुल के भरे दरबार में इस हकीकत का इकरार किया कि हुवा फ़ीना जू नसब यानी नबी बुलन्द खानदान है हालाँकि उस वक़्त वह आपके बदतरीन दुश्मन थे चाहते थे कि अगर ज़रा भी कोई गुन्जाइश मिले तो आपकी जाते पाक पर कोई ऐब लगाकर बादशाहे रोम की नज़रों से आपका मर्तबा गिरा दें 

📔मुस्लिम शरीफ में है कि अल्लाह तआला ने हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद में से किनान को वरगुज़ीदह बनाया किनान में से कुरैश को चुना कुरैश में से बनी हाशिम को मुन्तख़ब फ़रमाया बनी हाशिम में से मुझको चुन लिया!
 
🌊बहरहाल यह एक मानी हुई हक़ीक़त है कि हुजूरे अनवर का ख़ानदान इस कदर बुलन्द मर्तबा है कि कोई भी हसब व नसब वाला और नेमत व बुजुर्गी वाला आपके बराबर नहीं है

*(📚बुखारी शरीफ जिल्द -1 सफह, 4 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,36)*
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*⛺कुरैशी क्यूँ....🌊* 

💎हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम के खानदाने नुबुव्वत में सभी हज़रात अपनी गूनागों खुसूसियात की वजह से बड़े नामी गिरामी हैं! मगर चन्द हज़रात ऐसे हैं जो आसमाने फज्ल व कमाल पर चाँद तारे बन कर चमके! उन बाकमालों में से फ़हर बिन मालिक भी हैं उनका लकब कुरैश है और उनकी औलाद कुरैशी कहलाती है फ़हर बिन मालिक कुरैश इसलिए कहलाते हैं कि कुरैश एक समुन्दरी जानवर का नाम है जो बहुत ही ताक़तवर होता है समुन्दरी जानवरों को खा डालता है यह तमाम जानवरों पर हमेशा गालिब ही रहता है कभी नीचा नहीं होता! चूंकि फ़हर बिन मालिक अपनी बहादुरी और खुदादाद ताकत की बिना पर तमाम कबाइले अरब पर ग़ालिब थे इसलिए तमाम अहले अरब उनको कुरैश के लकब से पुकारने लगे चुनान्चे इस बारे में शमरख बिन अम हिसयरी का शेअर बहुत ही मशहूर है कि वक़ूरैशुन हियल्लती तस्कुनुल बहर बिहा सुम्मियत कुरैशुन कुरैशन - यानी कुरेश एक जानवर है जो जानवर समुन्दर में रहता है उसी के नाम पर कबीला ए कुरेश का नाम कुरैश रख दिया गया!

🌸हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के माँ बाप दोनो का सिलसिला ए नसब फहर बिन मालिक से मिलता है! इस लिए हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के माँ बाप दोनो की तरफ से क़ुरैशी हैं!
*(📚बुखारी शरीफ जिल्द -1 सफह, 4 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,36,37)*
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*🕋 हाशिम खानादन*

🔮 हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के परदादा हाशिम बड़ी शान व शौकत के मालिक थे उनका असली *अम्र* था ये बहुत ही बहादुर बेहद सख़ी और आला दर्जे के मेहमान नवाज़ थे! एक साल अरब में बहुत सख्त कहत पड़ गया और लोग दाने - दाने को मुहताज हो गए तो यह मुल्के शाम से सूखी रोटियाँ खरीद कर हज के दिनों में मक्का पहुँचे रोटियों का चूरा करके ऊँट के गोश्त के शोरबे में सरीद *एक किस्म का खाना बना कर* तमाम हाजियों को खूब पेट भर कर खिलाया! उस दिन से लोग उनको हाशिम *रोटियों का चूरा करने वाला* कहने लगे

🕌 चूंकि यह अब्दे मुनाफ के सब लड़कों में बड़े और बासलाहियत थे इसलिए अब्दे मुनाफ के बाद काबा के देखभाल करने वाले और सज्जादा नशीन हुए आप बहुत हसीन व खूबसूरत और अच्छे चेहरे वाले थे जब बालिग होने को पहुंचे तो उनकी शादी मदीना में कबीला *ए* नज़रज के एक सरदार *उमरु* की बेटी से हुई जिनका नाम *सल्मा* था । उनके बेटे अब्दुल मुत्तलिब मदीना ही में पैदा हुए! चूँकि हाशिम पच्चीस साल की उम्र पाकर मुल्के शाम के रास्ता में गज्ज़ा के मकाम में इन्तिकाल कर गए इसलिए अब्दुल -मुत्तलिब  मदीना ही में अपने नाना के घर पले बढ़े जब सात या आठ साल के हो गए तो मक्का - मुकर्रमा आकर अपने खानदान वालों के साथ रहने लगे
*(📚मदारिजुन नुवुव्वत जिल्द,2- सफ़ह,8)*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,36,37)*
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*🕌 हज़रत अब्दुल मुत्तलिब*

💎हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दादा अब्दुल मुत्तलिब का असली नाम *शैबा* है यह बड़े ही नेक- नफ्स और इबादत करने वाले व जाहिद थे गारे हिरा में खाना - पानी साथ ले कर जाते और कई कई दिनों तक लगातार ख़ुदा की इबादत में व्यस्त रहते रमज़ान शरीफ़ के महीने में ज्यादातर गारे हिरा में एतिकाफ किया करते थे ख़ुदा के ध्यान में अकेले रहा करते थे 

🏔️रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम का नूरे नुबुव्वत उनकी पेशानी में चमकता था उनके बदन में मुश्क खुश्बू आती थी अहले अरब खुसूसन कुरेश को उनसे बड़ी अकीदत थी मक्का वालों पर जब कोई मुसीबत आती या सूखा पड़ जाता तो लोग अब्दुल मुत्तलिब को साथ लेकर पहाड़ पर चढ़ जाते और बारगाहे खुदावन्दी में उनको वसीला बनाकर दुआ माँगते थे तो दुआ कबूल हो जाती थी यह लड़कियों को ज़िन्दा दफ़न करने से लोगों को बड़ी सख़्ती के साथ रोकते थे चोर का हाथ काट डालते थे 

🍲🦅अपने दस्तरख्वान से परिन्दों को भी खिलाया करते थे । इसलिए इनका लकब ' मुतइमुत - तैर *परिन्दों को खिलाने वाले* है शराब और ज़िना को हराम जानते थे और अकीदा के लिहाज़ से मुवहहिद थे ज़मज़म शरीफ का कुवाँ जो बिल्कुल पट गया था आपही ने उसको नए सिरे से खुदवाकर दुरुस्त किया लोगों को ज़मज़म के पानी से सैराब किया आप भी काबा के मुतवल्ली और सज्जादा नशीन हुए असहाबे फील का वाकिआ आपके वक़्त में पेश आया एक सौ बीस बरस की उम्र में आपकी वफ़ात हुई । 
*(📚जरकानी अलल - मवाहिब जिल्द -1 सफह -72 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,36,37)*
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*नह मदुहू व नुसल्ली अला रसूलिहिल करीम*

अल्हम्दु लिल्लाह ! खुदावंद कुद्दुस जल्ला जलालुहू का बेशुमार शुक्र है कि मेरी एक बहुत ही देरीना *पुरानी* और बहुत बड़ी दिली तमन्ना पूरी होती नजर आ रही है कि बहुत से मवाने *रुकावटों* के बावुजूद हुजूर अकदस शहंशाहे दो आलम की सीरते मुकद्दसा के अहम उन्वान पर यह कुछ औराक लिखने की मुझे सआदत नसीब हो रही है  *फ़ल्हम्दु लिल्लाहि अला एहसानिही* यह उन्वान अगरचे अपने मोजू के ऐतबार से बहुत ही मुख़्तसर है लेकिन बिहम्दिही तआला सीरते नबविया अला साहिबिहस्सलातु वस्सलाम के ज़रूरी मज़ामीन की एक हद तक मजमूआ है जिसको मैं चमनिस्ताने सीरत के गुलहा - ए - रंगारंग का एक मुकद्दस और हसीन गुलदस्ता वनाकर 'सिराते मुस्तक़ीम ग्रुप" के नाज़िरीन की ख़िदमत में पेश करने की रूहानी मुसर्रत हासिल कर रहा हूँ अल्हम्दु लिल्लाह मुझ नाचीज़ को इस मुकद्दस उन्वान पर पोस्ट लिखने की सआदत हासिल हुई इन्शा अल्लाह तआला त जिन्दगी तक हजारों लाखों खुशवख्त मुसलमान इस उन्वान को पाते रहेंगे!

*एडमिन*
*सिराते मुस्तक़ीम ग्रुप*
*जुनैद रज़ा अज़हरी*

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*🦅असहाबे फील का वाकिआ🐘*

🔮हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की पैदाइश से सिर्फ पचपन दिन पहले यमन का बादशाह अबरहा हाथियों की फौज ले कर काबा ढाने के लिए मक्का पर हमला आवर हुआ था इसका सबब यह था कि अबरहा ने यमन की राजधानी सनआ में एक बहुत ही शानदार और आलीशान गिरजाघर बनाया और यह कोशिश करने लगा कि अरब के लोग खाना *ए* काबा की जगह यमन आकर इस गिरजाघर का हज किया करें जब मक्का वालों को यह मालूम हुआ तो कबीला *ए* किनाना का एक शख्स गुस्से में जल भुनकर यमन गया वहाँ के गिरजा घर में पाखाना भर कर इसको गंदगी से लतपत कर दिया जब अबरहा ने यह वाकिआ सुना तो वह गुस्से में आपे से बाहर हो गया खाना *ए* काबा को ढाने के लिए हाथियों की फौज लेकर मक्का पर हमला कर दिया 

*🏹उसकी फौज के अगले दस्ते ने मक्का वालों के तमाम ऊँट और दूसरे जानवरों को छीन लिया इसमें दो सौ या चार सौ ऊँट अब्दुल मुत्तलिब के भी थे!!*

*(📚 जरकानी जिल्द -1 सफह -85 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,38)*
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*🦅असहाबे फील का वाकिआ🐘*

🏔️अब्दुल - मुत्तलिब को इस वाकिए से बड़ी तकलीफ पहुँची । चुनान्चे आप इस मामले में बातचीत के लिए उसकी फौज में तशरीफ ले गए जब अबरहा को मालूम हुआ कि कुरैश का सरदार उससे मुलाकात करने के लिए आया है तो उसने आपको अपने खेमे में बुला लिया जब अब्दुल - मुत्तलिब को देखा कि एक बुलन्द कद रोबदार और निहायत ही खूबसूरत आदमी हैं जिनकी पेशानी पर नूरे नुबुब्बत का जाह व जलाल चमक रहा है तो सूरत देखते ही अबरहा मुतअिस्सर हो गया बेइख़्तियार तख्ते शाही से उतर कर आपकी तअज़ीम व तकरीम के लिए खड़ा हो गया अपने बराबर बिठाकर पूछा कि कहिए सरदारे कुरेश! यहाँ आपकी तशरीफ आवरी का क्या मकसद है *अब्दुल - मुत्तलिब* ने जवाब दिया कि हमारे ऊँट और बकरियाँ वगैरह जो आपकी फोज के सिपाही हाँक लाए हैं आप उन सब जानवरों को हमारे हवाले कर दीजिए

🐫🐐यह सुनकर अबरहा ने कहा कि ऐ सरदारे कुरेश में तो समझता था कि आप बहुत ही हौसले वाले और शानदार आदमी हैं! मगर आपने मुझसे अपने ऊँटों का सवाल करके मेरी नज़रों में अपना मर्तबा कम कर दिया! ऊंट और बकरी की हकीकत ही क्या है मैं तो आपके काबा को तोड़ फोड़कर बरबाद करने के लिए आया हूँ! आपने इसके बारे में बात ही नहीं की! अब्दुलमुत्तलिब ने कहा कि मुझे तो अपने ऊँटों से मतलब है कअबा मेरा घर नहीं बल्कि यह खुदा का घर है! वह खुदा अपने घर को बचा लेगा । मुझे काबा की ज़रा भी फिक्र नहीं है यह सुनकर अबरहा अपने फ़िरऔनी अंदाज़ में कहने लगा कि ऐ सरदारे मक्का ! सुन लीजिए में काबा को ढाकर उसकी ईंट से इंट बजा दूंगा और ज़मीन से उसका नामो व निशान मिटा दूंगा क्योंकि मक्का वालों ने मेरे गिरजा घर की बड़ी बेइज्जती की है! इसलिए मैं उसका बदला लेने के लिए काबा को ढा देना ज़रूरी समझता हूँ!
*(📚 जरकानी जिल्द -1 सफह -85 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,38)*
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*🦅असहाबे फील का वाकिआ🐘*

💎अब्दुल मुत्तलिब ने फरमाया कि फिर आप जानें और खुदा जाने मैं आपसे पूछताछ करने वाला कोन इस बातचीत के बाद अबरहा ने तमाम जानवरों को वापस कर देने का हुक्म दे दिया अब्दुल मुत्तलिब तमाम ऊँटों और बकरियों को लेकर अपने घर चले गए मक्का वालों से फ़रमाया कि तुम लोग अपने अपने माल जानवरों को लेकर मक्का से बाहर निकल जाओ पहाड़ों की चोटियों पर चढ़कर और दुरों में छुपकर पनाह लो मक्का वालों से यह कहकर फिर आप अपने खानदान के कुछ आदमियों को साथ ले कर खाना ए काबा में गए दरवाजा का हल्का पकड़कर बहुत ही बेकरारी और आजिजी के साथ दरबारे बारी में इस तरह दुआ माँगने लगे कि:-

🤲🏼🌸ऐ अल्लाह ! बेशक हर आदमी अपने अपने घर की हिफाज़त करता है लिहाज़ा तू भी अपने घर की हिफाज़त फ़रमा और सलीब वालों और सलीब के पुजारियों *( ईसाइयों )* के मुकाबले में अपने मानने वालों की मदद फ़रमा अब्दुल मुत्तिलब ने यह दुआ माँगी और अपने खानदान वालों को साथ लेकर पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए खुदा की कुदरत का जल्वा देखने लगे अबरहा जब सुबह को काबा ढाने के लिए अपनी फौज का जत्था और हाथियों की कतार के साथ आगे बढ़ा मकामे *मुगुम्मस* में पहुँचा तो खुद उसका हाथी जिसका नाम महमूद था एक दम बैठ गया बहुत मारा और बार बार ललकारा मगर हाथी नहीं उठा इसी हालत में कहरे इलाही अबाबीलों की शक्ल में ज़ाहिर हुआ नन्हे नन्हे परिन्दे झुंड के झुंड जिनकी चोंच और पंजों में तीन तीन कंकरियां थीं समुन्दर की जानिब से हरमे काबा की तरफ आने लगे ।
*(📚 जरकानी जिल्द -1 सफह -85 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,39-40)*
*➡️जारी है...* अभी ये उन्वान कुछ दिन के लिए रोक दिया गया है
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*🦅असहाबे फील का वाकिआ🐘*

🗻अबाबीलों की इन फोजों ने अबरहा की फौज़ों पर इस जोर शोर से पत्थर की बारिश शुरू कर दी कि देखते ही देखते अबरहा का लश्कर और उसके हाथियों के परखच्चे उड़ गए अबाबीलों की पत्थर की बरसात खुदावन्दे कहहार व जब्बार के कहर व गज़ब की ऐसी मार थी कि जब कोई कंकरी किसी हाथी सवार के सर पर पड़ती थी तो वह उस आदमी के बदन को छेदती हुई हाथी के बदन से पार हो जाती थी अबरहा और उसके हाथी इस तरह तबाह व बरबाद हो गए कि उनके जिस्मों की बोटियाँ टुकड़ - टुकड़े हो कर ज़मीन पर बिखर गई चुनान्चे कुरआन मजीद की सूरह ए फ़ील में खुदावन्द कुद्दुस ने इस वाकिआ का ज़िक्र करते हुए इर्शाद फरमाया कि :-
 
*📄तर्जुमा यानी ( ऐ महबूब ! )* क्या आपने न देखा कि आपके रब ने उन हाथी वालों का क्या हाल कर डाला क्या उनके दाँव को तबाही में न डाला तो उन्हें चबाए हुए भुस जैसा बना डाला । 

⛰️जब अबरहा और उसके लश्करों का यह अंजाम हुआ तो अब्दुल मुत्तलिब पहाड़ से नीचे उतरे और खुदा का शुक्र अदा किया उनकी इस करामत का दूर दूर तक चर्चा हो गया तमाम अहले अरव उनको एक खुदा की बारगह में पहुंचे हुए बुजुर्ग की हैसियत से काबिले इहतराम समझने लगे!!
*(📚 जरकानी जिल्द -1 सफह -85 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,39-40)*
*➡️जारी है...*
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*🌸हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदे माजिद*

⚜️हज़रते अब्दुल्लाह यह हमारे हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदे माजिद हैं यह अब्दुल मुत्तलिब के तमाम बेटों में सब से ज़्यादा बाप के लाडले और प्यारे थे चूंकि उनकी पेशानी में नूरे मुहम्मदी अपनी पूरी शान व शौकत के साथ जलवागर था इसलिए हुस्न ब खूबी के पैकर और जमाले सूरत व अच्छी सीरत के आईनादार और पाकदामनी व पारसाई में बेमिसाल थे कबीला ए कुरेश की तमाम हसीन औरतें उनकी खूबसूरती पर आशिक और उनसे शादी की चाहत रखती थीं 

💫मगर अब्दुल मुत्तलिब उनके लिए एक ऐसी औरत की तलाश में थे जो खूबसूरती के साथ साथ हस्ब व नसब की शराफ़त और पाकदामनी में भी बेमिसाल हो अजीब इत्तिफ़ाक़ कि एक दिन अब्दुल्लाह शिकार के लिए जंगल में तशरीफ़ ले गए मुल्के शाम के यहूदी कुछ निशानियों से पहचान गए थे कि नबी आनिरुज्जमाँ के वालिद माजिदे यही हैं चुनान्चे इन यहूदियों ने हज़रते अब्दुल्लाह को बार बार कत्ल कर डालने की कोशिश की!
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*🌸हुजूर रहमते आलम के वालिदे माजिद*

🏹🐎इस मर्तबा भी यहूदियों की एक बहुत बड़ी जमाअत हथियारों से लैस होकर इस नीयत से जंगल में गई कि अब्दुल्लाह को अकेले में धोखे से कत्ल कर दिया जाए मगर अल्लाह तआला की हिफाज़त ने इस मर्तबा भी अपने फज्ल व करम से बचा लिया आलमे गैब से चन्द ऐसे सवार अचानक ज़ाहिर हुए जो इस दुनिया के लोगों से कोई मुशाबहत ही नहीं रखते थे इन सवारों ने आकर यहूदियों को मार भगाया और अब्दुल्लाह को हिफाज़त से उनके मकान तक पहुंचा दिया वहब बिन मुनाफ भी उस दिन जंगल में थे उन्होंने अपनी आँखों से यह सब कुछ देखा इसलिए उनको अब्दुल्लाह से बहुत ही मुहब्बत व अकीदत पैदा हो गई घर आकर यह इरादा कर लिया कि में अपनी नूरे नज़र आमिना की शादी अब्दुल्लाह ही से करूंगा 

🕌चुनान्चे अपनी इस दिली तमन्ना को अपने चन्द दोस्तों के जरीए उन्होंने अब्दुल मुत्तलिब तक पहुँचा दिया ख़ुदा की शान कि अब्दुल मुत्तलिब को अपने नूरे नज़र अब्दुल्लाह के लिए जैसी दुल्हन की तलाश थी वह सारी खूबियाँ हज़रत आमिना बिन्ते वहव में मौजूद थीं अब्दुल मुत्तलिब ने इस रिश्ते को खूशी खुशी मंजूर कर लिया चुनान्चे चौबीस साल की उम्र में हज़रते अब्दुल्लाह का हज़रते बीबी आमिना से निकाह हो गया नूरे मुहम्मदी हज़रते अब्दुल्लाह से मुन्तकिल होकर हज़रते बीबी आमिना के शिकमे अतहर यानी  *(पेट )* में जलवागर हो गया जब हमल शरीफ को दो महीने पूरे हो गए तो अब्दुल - मुत्तलिब ने हज़रते अब्दुल्लाह को खजूरें लेने के लिए मदीना शरीफ भेजा या तिजारत के लिए मुल्के शाम रवाना किया वहाँ से वापस लौटते हुए मदीने में अपने वालिद के ननिहाल बनू अदी बिन नज्जार में एक महीना बीमार रह कर पच्चीस बरस की उम्र में वफात पा गए *वहीं दारे नाबगा में दफ़न किए गए*

*(📚जकरानी अलल मवाहिब जिल्द 1 सफ़ह 101)*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,39-40)*
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*🇮🇳"सिराते मुस्तक़ीम*
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*💎हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कि जिन्दगी मुबारका*
           पोस्ट नम्बर::-1️⃣2️⃣

*🌸हुजूर रहमते आलम के वालिदे माजिद*

⛺काफिला वालों ने जब मक्का वापस लौटकर अब्दुल मुत्तलिब को हज़रते अब्दुल्लाह की बीमारी का हाल सुनाया तो उन्होंने ख़बरगीरी के लिए अपने सबसे बड़े लड़के हारिस को मदीना शरीफ़ भेजा उनके मदीना पहुँचने से पहले ही हज़रते अब्दुल्लाह का इंतेकाल ( मृत्यु ) हो चुका था हारिस ने मक्का वापस होकर जब वफ़ात की खबर सुनाई तो सारा घर मातम कदा बन गया बनू हाशिम के हर घर में मातम बरपा हो गया खुद हज़रते आमिना ने अपने मरहूम शौहर का ऐसा पुरुदर्द मरसिया कहा है कि जिसको सुनकर आज भी दिल दर्द से भर जाता है 

📜रिवायत है कि हज़रत अब्दुल्लाह की वफ़ात पर फरिश्तों ने गमगीन होकर बड़ी हसरत के साथ कहा कि इलाही! तेरा नबी यतीम हो गया हज़रते हक ने फरमाया क्या हुआ मैं इसका हामी व हाफिज़ हुँ!!
 
💎हज़रते अब्दुल्लाह का तर्का एक लोंडी उम्मे ऐमन जिनका नाम बरका था कुछ ऊँट कुछ बकरियाँ थी यह सब तर्का हुजूर को मिला उम्मे ऐमन बचपन में हुजूर अकदस की देखभाल करती थी खिलाती कपड़े पहनाती परवरिश की पूरी ज़रूरियात का इंतजाम करतीं इस लिए हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम उम्र उम्मे ऐमन की दिलजोई फरमाते रहे अपने महबूब व मुतबन्ना गुलाम हज़रते ज़ैद बिन हारिसा से उनका निकाह कर दिया और उनके शिकम *( पेट )* से हज़रते उसामा पैदा हुए ।

*( 📚मदारिजुनुबूव्व जिल्द 2 सफह 14 )*
*(📚सीरते मुस्तफ़ा पहला बाब सफ़ह,41-42)*
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