हमारे मसाइल और उनका हल"
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
_आओ इल्म आम करें_
*"हमारे मसाइल और उनका हल"*
_पोस्ट-:: 1_
*बा वुज़ू सोना*
📜जलीलुल क़दर सहाबी हज़रत अनस इब्ने मालिक रदियल्लाहो तआला अन्हु फरमाते हैं कि ताजदारे कौनेन सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया कि जो मुसलमान बा वुज़ू सोए और उसी शब में इन्तिकाल हो जाए तो उसको मर्तबा ए शहादत नसीब होगा !
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*जुते पहनने और उतारने का इस्लामी तरीक़ा*
📜हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहो तआला अन्हु फरमाते हैं कि सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया जब तुम मे से कोई जूता पहने तो पहले दायां फिर बायां और जब उतारे तो पहले बायां फिर दायां ! नीज़ फरमाया कि एक जुता पहन कर न चले या दोनों पहने या दोनों उतार दे !
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*एक बहुत जरूरी मसला*
📜जिससे आम तौर पर लोग नावाक़िफ़ हैं यह है कि ओघंने या बैठे बैठे झोंक लेने से वज़ू नही जाता ! इसी तरह झुमकर गिर पड़ा और फौरन आंख खुल गई तो वुज़ू न गया ! लोग इन सुरतों में यह समझते है कि वुज़ू जाता रहता है !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 41 व 90)*
*➡जारी...*
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
_आओ इल्म आम करें_
*"हमारे मसाइल और उनका हल"*
_पोस्ट-:: 2_
*नीयत का मसला*
❄नीयत दिल के पक्के इरादे को कहते हैं ! महज़ जानना नीयत नही ! नीयत का अदना दर्जा यह है कि अगर उस वक्त कोई पुछे कौन सी नमाज़ पढ़ते हो तो बिला तअम्मुल बता सके अगर हालत ऐसी है कि सोच कर बताऐगा तो नमाज़ न होगी !
*📜मसला:-* ज़बान से कह लेना मुस्तहब है और इसमें अरबी ज़बान की तख़सीस नहीं उर्दू व फारसी में भी हो सकती है !
*📜मसला:-* फर्ज नमाज में नीयते फर्ज़ भी जरूरी है ! मुतलक नमाज़ की नीयत काफी नहीं और फर्ज नमाज़ में यह भी जरूरी है कि उस खास नमाज़ मसलन ज़ुहर या असर की नीयत करे !
*📜मसला:-* नीयत में तादाद रक़अत जरूरी नही अलबत्ता अफ़जल है !
*📜मसला:-* नफ्ल व सुन्नत व तरावीह में मुतलक़ नमाज़ की नीयत काफ़ी है मगर एहतियात यह है कि तरावीह में तरावीह की और सुन्नतों में सुन्नते रसूलल्लाह की नीयत करे !
*📜मसला:-* यह नीयत की मुँह मेरा किब्ला कि तरफ है ! शर्त नही ! अलबत्ता यह जरूरी है कि किब्ला से एराज की नीयत न हो !
*📜मसला:-* मुक्तदी को इक़तेदा की नीयत भी जरूरी है और इमाम को इमामत की नीयत करना मुक़तदी की नमाज़ सही होने के लिए जरूरी नही ! यहाँ तक कि अगर इमाम ने यह नियत कर ली कि मैं फलाँ शख्स का इमाम नहीं हूँ और उस शख्श ने उसकी इक़तेदा की तो नमाज़ तो हो गई मगर सवाब ए जमाअत न पाऐगा !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 97)*
*➡जारी...*
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
_आओ इल्म आम करें_
*"हमारे मसाइल और उनका हल"*
_पोस्ट-:: 3_
*ज़रूरी मसअला जिससे लोग ग़ाफ़िल हैं*
✨और ग़फ़लत की वजह से नमाज़ें खराब हो रही है ! यह है कि सज्दे में हर पांव की तीन तीन उंगलियों के पेट का ज़मीन पर लगना वाजिब है अगर ऐसा न किया तो नमाज़ का दुहराना ज़रूरी है वरना गुनाहगार होगा और सज्दे में दोनों पाँव की दसों उंगलियों के पेट ज़मीन पर लगना सुन्नत है !
*📜मसअला:-* जब दोनों सज्दे कर ले तो रकअत के लिए पंजो के बल घुटनों पर हाथ रखकर उठे ! यह सुन्नत है और कमजोरी वगैरह उज्र के सबब अगर ज़मीन पर हाथ रख कर उठे जब भी हर्ज नहीं ! अब दुसरी रकअत में "सुब्हान" और "अऊजु" न पढ़े ! दुसरी रकअत के सज्दों से फारिग़ होने के बाद बायां पांव बिछा कर दोनों सुरीन उस पर रखकर बैठना और दाहिना क़दम खड़ा रखना और दाहिने पांव की उंगलियां क़िब्ला रूख़ करना यह मर्द के लिए है !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 114)*
*➡जारी...*
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
_आओ इल्म आम करें_
*"हमारे मसाइल और उनका हल"*
_पोस्ट-:: 4_
*नमाज़ी के आगे से गुज़रने का इस्लामी तरीक़ा*
✨बरवक़्त जरूरत यह है कि जो शख्स गुजरना चाहता है अगर उसके पास कोई चीज़ सुतरे के क़ाबिल हो तो उसे नमाज़ी के सामने रखकर गुज़र जाऐ फिर उस चीज़ को उठाले और अगर दो शख़्श गुज़रना चाहते हैं और सुतरे के क़ाबिल कोई चीज़ नहीं तो उनमें एक नमाज़ी के सामने उसकी तरफ़ पीठ कर के खड़ा हो जाए और दुसरा उसकी आड़ पकड़ कर गुजर जाऐ फिर दुसरा उसकी पीठ के पीछे नमाज़ी की तरफ़ पुश्त करके खड़ा हो जाए और यह गुजर जाए फिर दुसरा जिधर से उस वक्त आया था उसी तरफ़ हट जाऐ !
*🖋मसअला:-* मस्जिदुल हराम शरीफ मे नमाज़ पढ़ता हो तो उसके आगे तवाफ़ करते हुऐ लोग गुजर सकते हैं !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 123)*
*➡जारी...*
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
_आओ इल्म आम करें_
*"हमारे मसाइल और उनका हल"*
_पोस्ट-:: 5_
*खुब याद रखिए*
*🖋मसअला:-* जलती आग नमाजी के आगे होना मकरूह है ! शमअ या चिराग़ में कराहत नही ! हाथ में कोई ऐसा माल हो जिसके रोकने की जरूरत होती है उसको लिए नमाज़ पढ़ना मकरूह है मगर जब ऐसी जगह हो कि बगैर उसके हिफ़ाजत नामुम्किन हो जाऐगी तो मकरूह नही !
*🖋मसअला:-* कालीन और बिछौने पर नमाज़ पढ़ने मे हरज नहीं ! जब कि इतने नरम और मोटे न हों कि सज्दे में पेशानी न ठहरे वरना नमाज़ न होगी !
*🖋मसअला:-* ऐसी चीज़ के सामने जो दिल को मशग़ूल रखे नमाज़ मकरूह है ! मसलन ज़ीनत और लहव व लइब वगैरह इसी तरह नमाज़ के लिए दौड़ना भी मकरूह है !
*🖋मसअला:-* मस्जिद में कोई जगह अपने लिए खास कर लेना कि वहीं नमाज़ पढ़े मकरूह है !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 133)*
*➡जारी...*
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
_आओ इल्म आम करें_
*"हमारे मसाइल और उनका हल"*
_पोस्ट-:: 6_
*नमाज़ तोड़ना कब जाइज़*
_✨सांप वगैरह मारने के लिए जब कि इज़ा का सही अन्देशा हो या कोई जानवर भाग गया ! उसके पकड़ने के लिए या बकरियों पर भेडिये के हमला करने के खौफ़ से नमाज़ तोड़ देना जाईज है ! यूँ ही अपने या पराऐ एक दिरहम यानी सवा चार आने और तकरीबन एक पाई के नुकसान का खौफ़ हो ! मसलन दुध उबल जाऐगा या गोश्त तरकारी रोटी वगैरह जल जाने का खौफ़ हो या एक दिरहम की कोई चीज़ चोर उचक्का ले भागा तो इन सब सुरतों में नमाज़ तोड़ देने की इजाज़त है !_
*नमाज़ तोड़ना कब वाजिब है*
_✨कोई मुसीबत ज़दा फरियाद कर रहा हो ! किसी नमाजी को पुकार रहा हो या मुतलकन किसी शख्श को पुकारताहो या कोई डुब रहा हो या कोई आग से जल जाऐगा या कोई अंधा राहगिर कूंवे में गिरा चाहता हो तो इन सब सुरतों में नमाज़ तोड़ देना वाजिब है जबकि यह उसके बचाने पर क़ादिर हो !_
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 134)*
*➡जारी...*
👑"सिराते मुस्तक़ीम"🍂:
*🇮🇳सिराते मुस्तक़ीम*
_आओ इल्म आम करें_
*"हमारे मसाइल और उनका हल"*
_पोस्ट-:: 7_
*कभी न भुलियेगा*
✨कि मासूम होना नबी और फरिश्ते का खास्सा है उनके सिवा कोई मासूम नहीं इमामों को अम्बिया की तरह मासूम समझना जैसे शीआ समझते हैं गुमराही है और अक्सर लोग बच्चों को मासूम कह दिया करते हैं, बच्चों पर इस लफ़्ज़ को बोलने से इजतेनाब करना चाहिए !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 150)*
*📄मसअला:-* दरमियाने तिलावत में कोई दुनियवी कामकरे तो _अऊज़ु बिल्लाह_ और _बिस्मिल्लाह_ फिर पढ़ ले और अगर दीनी काम किया जैसे सलाम या अज़ान का जवाब दिया तो _अऊज़ु बिल्लाह_ फिर पढ़ना उसके ज़िम्मे नहीं _बिस्मिल्लाह_ पढले !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 158)*
*नमाज़ ए तहय्यतूल वज़ू*
✨वज़ू के बाद आजा खुश्क होने से पहले दो रकअत नमाज पढ़ना मुस्तहब है इस नमाज़ को तहय्यतुल वज़ू कहते हैं! वज़ू के बाद फर्ज वगैरह पढ़े तो तहय्यतुल वजू के काइम मकाम हो जाऐंगे !
*📚(निजामे शरीअत, सफ़ा 178)*
*➡उनवान खत्म...*
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